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Hi! This is Manish Pathak from the Village Samar of the district Sitamarhi (Bihar) in India. I have done my M. Sc. in Mathematics and Computing from IIT Guwahati in 2007. I did my B. Sc. in Math Hons. from B. R. A. Bihar University Muzaffarpur in Bihar. Currently, working at Innodata Isogen PVT LTD, in Noida. I have worked as a research Associate/free lancer for different organizations (like universities/institutes, news channels or different organisations) time to time for a certain project related to Market analysis, data analysis, statistical analyst. The companies/Organisations in which I was worked earlier are listed below: 1. innodata 2. S. Chand Tech. Pvt. Ltd. 3. Classteacher Learning Systems. 4. EXL Services Noida 5. Research Associate at M. D. I. Gurgaon. 6. iLex Media Solutions Pvt. Ltd. 7. iEnergizer, Noida. I am residing in Noida, Sec -66. Contact No.: 9650173039 email: pathakjee@gmail.com

Monday, February 28, 2011

योगी आएं राजनीति में.......भ्रष्ट राजनीति वाले बार बार बाबा रामदेव पर यह आरोप लगा रहे हैं कि वे एक योगी हैं तब वे राजनीति में‌ क्यों आ रहे हैं? --विश्व मोहन तिवारी


भ्रष्ट राजनीति वाले बार बार बाबा रामदेव पर यह आरोप लगा रहे हैं कि वे एक योगी हैं तब वे राजनीति में‌ क्यों आ रहे हैं? वे और अनेक विद्वान यह मानते हैं कि योगियों‌ का राजनीति में आना गलत है। वे यह मानकर बैठे हैं कि योगी के आने से राजनीति धर्म निरपेक्ष नहीं रहेगी। योगी‌ का धर्म में गहरा विश्वास क्या उसे राजनीति में प्रवेश के लिये अयोग्य बना देता है ? क्या धर्म में गहरा विश्वास व्यक्ति को राजनीति में धर्म निरपेक्ष व्यवहार नहीं करने देगा ? अर्थात जो भी व्यक्ति राजनीति में‌ हैं उनका धर्म में गहरा विश्वास नहीं है? इस तरह की कुतर्की बातें कर जनता को भ्रमित किया जा रहा है। एक दल के राजनीतिज्ञ और अधिकांश माध्यम वाले बाबा पर यह प्रश्न एक प्रक्षेपास्त्र की तरह फ़ेक रहे हैं।
बाबा रामदेव भी जैसे दूध का जला छाँछ को भी फ़ूक फ़ूक कर पीता है, उत्तर देते हैं कि वे राजनीति में‌ प्रवेश नहीं कर रहे हैं वरन भ्रष्ट राजनीति में हस्तक्षेप कर उसे साफ़ सुथरा करना चाहते हैं ताकि यह राष्ट्र सम्मान से प्रगति कर सके । व्यक्तिगत रूप से बाबा चाहे राजनीति में न आना चाहें, किन्तु सिद्धान्तन उऩ्हें यह प्रश्न करना चाहिये कि एक योगी राजनीति में‌ क्यों‌ नहीं आ सकता!!
यदि हम थोड़ा ध्यान से सोचें तब यह तो स्पष्ट हो जाएगा कि एक राजनीतिज्ञ को अन्दर बाहर दोनें से साफ़ रहना चाहिये, अर्थात उसका चरित्र उज्वल होना चाहिये, उसे राष्ट्र की सेवा बिलकुल निस्वार्थ होकर करना चाहिये। उसे राष्ट्र की, गरीबों की उन्नति बिना उनके रंग, धर्म या जाति को महत्व देते हुए उऩ्हें मनुष्य समझते हुए करना चाहिये।
यदि हम थोड़ा और ध्यान से सोचें तब पाएंगे कि योगी में‌ यह सब गुण होते हैं।
आज देश को भ्रष्टाचार के दलदल में फ़ँसी राजनीति को उबारने के लिये यह वांछनीय है कि योगी या योगी के समान चरित्रवान व्यक्ति राजनीति में आएं।

कालेधन की कालिख और कांग्रेस की कसक --डॉ.मनोज जैन


स्वामी रामदेव के कालाधन और भ्रष्टाचार बिरोधी अभियान से घबरा कर भ्रष्टाचार के दलदल में गहरे तक धंसी हुयी कांग्रेस पार्टी का बौखला कर अमर्यादित आचरण करना कोई नई बात नहीं है यह तो कांग्रेस की कार्यसंस्कृति का हिस्सा है। कांग्रेस पार्टी में भ्रष्टाचार का स्तर यह हो गया है कि भ्रष्टाचार और कांग्रेस एक ही सिक्के के दो पहलू हो गये हैं। यही कारण है कि जब भी कोई भ्रष्टाचार के सफाये की बात करता है तो काग्रेंस पार्टी को यह लगता है कि उसके सफाये की बात की जा रही है।
दिग्विजय सिंह की हालत आजकल इतनी पतली हो गयी है कि वह 10 जनपथ में अपने नंबर बढवाने की खातिर हर बार इतनी उटपंटाग हरकत करते हैं कि उनको राजनीतिक गलियारों में काग्रेसी विदूषक कहा जाने लगा है। कभी आर.एस.एस. के विरुद्ध विषवमन तो कभी दिवंगत हेमन्त करकरे के बारे में अर्नगल बयानबाजी, तो कभी आजमगढ की तीर्थयात्रा तो अब स्वामी रामदेव के बारे में बेमतलब की बयानबाजी करके काग्रेंस पार्टी के महासचिव दिग्विजय सिंह अपने आपको राजमाता सोनिया गांधी का राजाबेटा साबित करना चाहते हैं।
यद्यपि स्वामी रामदेव ने पहले ही यह स्वीकार किया है कि उनके ट्रस्ट के सभी खाते विधिवत तरीके से आडिट किये जाते हैं और उनका आना-पाई से व्यवस्थित हिसाब-किताब भी रखा जाता है तथा उनके ट्रस्ट के पास 1,115 करोड़ की संपत्ति है। परन्तु स्वामी रामदेव से हिसाब मांगने से पूर्व दिग्विजय सिंह को स्वयं अपना हिसाब प्रस्तुत करना चाहिये था। यही नहीं गांधी परिवार और उनके ट्रस्टों की अकूत संपत्ति का ब्यौरा मांगना चाहिये। देश में हर व्यक्ति की संपत्ति के स्रोतों के बारे में जानने का देश को हक हैं परन्तु ऐसी क्या बात है कि जब भी भ्रष्ट्राचार पर हमला बोलने की बात होती है तो केवल कांग्रेस पार्टी को क्यों लगता है कि उस पर ही हमला बोला जा रहा होता है और जबाब में कांग्रेस पार्टी के वफादार उत्तेजित होकर हमला कर देतें हैं चाहे वह निनोंग इरिंग हो या दिग्विजय सिंह सबका मतलब एक ही है कि अपने आपको सोनिया गांधी का वफादार सेवक साबित करना।
स्वामी रामदेव आज न केवल भारत में अपितु सारी दुनिया में योग और स्वदेशी के हीरो के रूप में खडे हुये है। एक ऐसे समय में जब हमारे देश में रोल माडॅल की कमी को बहुत गहराई से अनुभव किया जा रहा है ऐसे में स्वामी रामदेव आशा की एक किरण के रुप में सामने आये हैं उन्होनें केवल योग ही नहीं अपितु स्वदेशी के माध्यम से आयुर्वेद, भारतीय भोजन, सहित रोजमर्रा के उपयोग में आने वाली वस्तुओं के उत्पादन के द्वारा लाखों लोगों को रोजगार प्रदान किया है। उनके विजन में देश का उत्थान स्पष्ट दिखाई दे रहा हैं। भारत में एक अहिंसक क्रान्ति महात्मा गांधी के नेतृत्व में की थी और दूसरी अंहिसक क्रान्ति की पदचाप स्वामी रामदेव के नेतृत्व में होने की पदचाप सुनाई दे रही है। अभी 2 जनवरी से 5 जनवरी को सम्पन्न हुये प्रथम अन्‍तरराष्ट्रीय योग सम्मेलन में दुनियाभर के महान विश्वविद्यालयों और मेडीकल कालेजों के प्रोफेसरों ने स्वामी रामदेव के द्वारा किये जा रहे कार्यो को मानवता के लिये महान योगदान के रुप में स्वीकार किया था। लेखक उस घटनाक्रम का साक्षी रहा है। महात्मा गांधी के बाद स्वामी रामदेव ऐसे व्यक्तित्व हुये हैं कि उनकी एक झलक पाने के लिये जनसैलाब उमड़ पड़ता है। महात्मा गांधी की हत्या भले ही नाथूराम गोडसे की गोली से हुयी हो पर गाधीं के विचारों की, उनकी नीतियों की, उनके सिध्दान्तों की हत्या का आरोपी यदि कोई है तो बह निश्चित ही काग्रेंस पार्टी ही है। गांधी जी की हत्या को तो देश ने बर्दास्त कर लिया पर यदि स्वामी रामदेव के साथ कुछ हो जाता है तो देश उसे नहीं झेल पायेगा। इसलिये देश को स्वामी रामदेव और उनके क्रान्तिकारी विचारों का संरक्षण पोषण करना ही चाहिये।

भ्रष्टों के सरदार मनमोहन


आज की युवा होती पीढ़ी को शायद इस बात का भान नहीं है कि गोरी चमड़ी वालों के अत्याचारों को किस कदर सहकर देश पर प्राण न्योछावर करने वालों ने इस देश को आजादी दिलवाई है। दिन रात अंग्रेजों के जुल्मों को सहा और स्वतंत्रता का बिगुल फूंका। देश आजाद हुआ] फिर भारत गणराज्य की स्थाना के बाद से इसने प्रगति के सौपान तय करना आरंभ कर दिया। लगता है भारत के आजाद होने के समय की कुंडली में कुछ दोष अवश्य ही है, यही कारण है कि जैसे जैसे समय बीतता गया देश में सुशासन की जगह कुशासन हावी होता गया।
कांग्रेस में पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी को भविष्यदृष्टा के तौर पर देखा जाता है। राजीव गांधी ने ही इक्कीसवीं सदी के भारत की कल्पना की थी। आज अगर वे सशरीर होते तो निश्चित तौर पर देश के हालातों को देखकर यही कहते कि इक्कीसवीं सदी के इस भारत की कल्पना उन्होंने कतई नहीं की थी, और वह भी तब जब मूलतः इटली निवासी उनकी अर्धांग्नी श्रीमति सोनिया गांधी के इर्द गिर्द सत्ता की धुरी घूम रही हो, जब उनके साहेब जादे राहुल गांधी को देश का वजीरे आजम बनाने की तैयारियों को अंतिम रूप दिया जा रहा हो तब।
कांग्रेसनीत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की दूसरी पारी में केंद्र सरकार ने जो भद्द पिटवाई है, उसकी महज निंदा करने से काम चलने वाला नहीं है। हालात देखकर यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि इक्कीसवीं सदी के जनसेवक वाकई मोटी चमड़ी वाले हैं उनकी सेहत पर घपले, घोटालों, भ्रष्टाचार की चीत्कार, अबलाओं बच्चों का रूदन, भूखे पेट दो तिहाई से अधिक जनता की बेबस नजरों का कोई असर पड़ने वाला नहीं है। आज की तस्वीर देखकर हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि वर्तमान शासक निरंकुश, निडर, जल्लाद, राक्षस और न जाने किस किस भूमिकाओं में अपने आप को उतारते जा रहे हैं। देश में घपले घोटाले सरेआम सामने आते जा रहे हैं] किन्तु न तो कोई प्रधानमंत्री डाॅ.मनमोहन सिंह, न सोनिया या राहुल गांधी] न ही कांग्र्रेस या उसके घटक दलों के मंत्री संत्री यहां तक कि विपक्ष में बैठे जनता के चुने हुए नुमाईंदे भी उसी थाप पर ही मुजरा करते नजर आ रहे हैं जो ताल भ्रष्टाचारियों द्वारा बजाई और सुनाई जा रही है।
एक समय था जब भ्रष्टाचार और घूसखोरी की खबरें सुनकर ही लोगों का खून खौल उठता था और इसमंे संलिप्तता वाला व्यक्ति समाज में शर्म के साथ सर झुकाए बैठा होता था। विडम्बना देखिए कि आज के इस समय में भ्रष्टाचार को व्यवस्था की विकृति के स्थान पर शिष्टाचार या एक व्यवस्था ही माना जाने लगा है। आम आदमी के मन में यह बात आने लगी है कि सरकारी तंत्र में बैठे लोगों द्वारा चोर उचक्के और मवालियों को लूटने के सारे माग्र प्रशस्त कर जनता को सरेआम लुटवाया जा रहा है, फिर इन लुटेरों से बाकायदा हफ्ता वसूला जा रहा है। देश की सबसे बड़ी अदालत भी भ्रष्ट अफसरों के खिलाफ मुकदमा चलाने की प्रक्रिया को आसान करने और उनकी संपत्ति को कुर्क करने की वकालत करती है तो भारत के संविधान के अनुच्छेद 311 में किए गए प्रावधान इसमंे आड़े आ जाते हैं।
भारत में इतने घपले और घोटाले सामने आए हैं कि बदमाशों के नामों के आगे उर्फियत का उपयोग करने वाले भारत उर्फ घपलों घोटालों का देश न कहने लगें। देश भर में अगर घपलों और घोटालों पर प्राथमिकी दर्ज करवाई जाए तो इसकी तादाद दस हजार के उपर पहुंच सकती है।
राजीव गांधी के कार्यकाल में 64 करोड़ रूपयों का बोफोर्स घोटाला सामने आया। उस वक्त सस्ताई का जमाना था, इसलिए 64 करोड़ रूपयों की कीमत काफी अधिक थी। इसके बाद 133 करोड़ का यूरिया घोटाला, साढ़े नौ सो करोड़ का चारा घोटाला, चार हजार करोड़ का बिग बुल वाला शेयर घोटाला, सात हजार करोड़ का राजू वाला सत्यम घोटाला, 43 हजार करोड़ का तेलगी का स्टेम्प घोटाला, सुरेश कलमाड़ी के नाम पर कामन वेल्थ गेम्स के नाम से सत्तर हजार करोड़ रूपयों का घोटाला, आदिमत्थू राजा का 2जी घोटाला एक लाख 67 हजार करोड़ का है। फिर दो लाख करोड़ के लगभग अनाज घोटाला भी सामने आया है। इस तरह घपले घोटालों में पांच लाख करोड़ रूपयों से ज्यादा का धन लूटा गया है। इतना धन तो मुगल आक्रांताआंे या गोरी चमड़ी वाले विदेशियों ने भारत से नहीं लूटा था।
अब देखिए कि कांग्रेस ने कितनी चतुराई से अपने दामन के दागों को धोने का कुत्सित प्रयास किया। सबसे पहले तो बोफोर्स प्रकरण में सभी आरोपियों के खिलाफ केस को बंद कर दिया गया। इसके बाद लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति का प्रकरण आया, जैसे ही लालू यादव ने आंखें तरेरी कांग्रेस ने सीबीआई के माध्यम से लालू को साईज में लाया गया। निचली अदालत के फैसले के खिलाफ सराकर द्वारा उच्च अदालतों में अपील ही दायर नहीं की। इसी तरह चारा घोटाले के मुख्य आरोपी लालू प्रसाद यादव और जगन्नाथ मिश्रा को डेढ़ दशक बाद भी सजा नहीं दी।
हवाला कांड में केंद्रीय जांच ब्यूरो द्वारा जुटाए गए सारे साक्ष्य उच्च न्यायालय द्वारा सिरे से खारिज कर दिए गए। झारखण्ड मुक्ति मोर्चा सांसद खरीदी कांड में एक भी आरोपी के खिलाफ चार्ज शीट नहीं पेश की गई है। इसी तरह पूर्व रेल मंत्री सी.के.जाफरशरीफ के खिलाफ प्राथमिकी तो दर्ज है किन्तु चार्जशीट दाखिल नहीं की गई है। ताज कारीडोर मामले में अधिकारियों के खिलाफ तो चार्जशीट है किन्तु मंत्रियों को इससे महफूज ही रखा गया है।
उत्तर प्रदेश की निजाम मायावती के खिलाफ भी आय से अधिक संपत्ति का मामला सात साल से घिसट रहा है, इसमें भी नतीजा सिफर ही है। विधायकों की खरीद फरोख्त के मामले में छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के खिलाफ सात साल से मामला अधर में ही है।
मामला काले धन का आता है तो सारे के सारे ‘‘माननीय‘‘ एक सुर में टर्राने लगते हैं। ये वो सारे प्रश्न हैं, जिनका उत्तर देश की जनता हर हाल में चाहती है, वह भी ईमानदार छवि के धनी वजीरे आजम डाॅक्टर मनमोहन सिंह से। डाॅ.सिंह को जवाब देना ही होगा कि आखिर सत्ता की वो कौन सी मलाई है, जिसे चखने के लिए मनमोहन ने अपना ईमानदारी वाला चोला उतार फेंका है और आज बेईमान, भ्रष्ट, घपले, घोटालेबाज देशद्रोहियों के सरदार बने बैठे हैं। आखिर कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी अपनी आंखे बंद करके देश को किस अंधेरी सुरंग की ओर धकेलना चाह रही हैं?

Sunday, February 27, 2011

भ्रष्टाचार का मुद्दा परिवर्तन का उत्प्रेरक बन सकता है --लालकृष्ण आडवाणी


भारत को स्वतंत्र हुए अब छ: दशक से ज्यादा हो गए। पहले तीन दशकों में कांग्रेस पार्टी का प्रभुत्व राजनीतिक परिदृश्य पर विशालकाय की भांति छाया रहा। अनेक राज्यों में यह सत्ता में थी। लोकसभा में, गैर -कांग्रेस दल इतनी संख्या नही जुटा पाए थे कि उन्हें मान्यता प्राप्त विपक्ष का पद मिलता और इसके नेता, नेता विपक्ष बन पाते।

सत्तार के दशक के मध्य में गुजरात में भ्रष्टाचार के विरुध्द एक सशक्त विद्यार्थी आंदोलन उभरा। इससे प्रेरित होकर जयप्रकाशजी ने भी बिहार में भ्रष्टाचार के विरुध्द विद्यार्थियों को जुटाया। इसी अभियान ने जे0पी0 को अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के करीब लाया और उसके माध्यम से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के। इसके अलावा चुनाव सुधारों में उनकी रुचि के चलते मैं उनसे अलग से मिलता रहता था। उन दिनों वह दोहराते थे कि सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार की जड़ें कांग्रेस सरकारों के अपने भ्रष्टाचार में है। जब तक विपक्षी दल विभाजित रहेंगे तब तक इस बुराई का मुकाबला असरदार ढंग से नहीं किया जा सकेगा।

अत: भ्रष्टाचार के विरुध्द जे0पी0 आंदोलन जनसंघ, काग्रेस (ओ), समाजवादी पार्टी, और भारतीय लोकदल को एक साथ लाया। अतत: इन दलों ने कांग्रेस के अजेय गढ़ गुजरात में जनता मोर्चे के रुप में महत्वपूर्ण विजय प्राप्त की।

गुजरात का निर्णय 12 जून, 1975 को घोषित हुआ। ठीक उसी दिन इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने रायबरेली से लोकसभा के लिए चुनी गई प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का चुनाव अवैध घोषित करते हुए भ्रष्ट चुनाव साधनों के आधार पर आगामी वर्षों के लिए चुनाव लड़ने हेतु अयोग्य करार दे दिया। 12 जून को घटित इन दोनों घटनाओं ने आपातकाल, एक लाख से ज्यादा लोगों को बंदी बनाने, प्रेस पर सेंसरशिप इत्यादि जैसी घटनाओं को जन्म दिया जिसकी समाप्ति मार्च 1977 में लोकसभा चुनाव से हुई जब कांग्रेस बुरी तरह पराजित हुई और श्री मोरारजी भाई के नेतृत्व में पहली गैर कांग्रेसी सरकार गठित हुई। नवगठित जनता पार्टी में जनसंघ का विलय हुआ और वह इस सरकार का एक घटक था। आज की द्विधु्रवीय राजनीति के बीज उसी समय पड़ हो गए थे।अत: इससे स्पष्ट होता है कि हमारे राजनीतिक इतिहास में निर्णायक मोड़ का पहला उत्प्रेरक भ्रष्टाचार था।

इसलिए यदि हमारे संविधान के अंगीकृत किए जाने के 6 दशक पश्चात दूसरी बार यदि भ्रष्टाचार परिवर्तन का मुख्य उत्प्रेरक बनने जा रहा है, तो किसी को भी आश्चर्य नहीं होगा।

जब सन् 2011 प्रारम्भ हुआ तो मैंने टिप्पणी की थी कि हाल ही में समाप्त हुआ वर्ष घपलों और घोटालो का वर्ष था। वास्तव में लोकसभा के शीतकालीन सत्र के पहले दिन ही भाजपा के नेतृत्व में समूचे विपक्ष ने तीन घोटाले – राष्ट्रमंडल खेल घोटाला, 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला और मुंबई की रक्षा भूमि घोटाले को उठाने का निर्णय किया।

यदि पहले दिन ही विपक्ष को उसकी बात कहने दी जाती तो उस दिन से बना गतिरोध जो पूरे सत्र में बना रहा, शायद नहीं होता। विपक्ष का गुस्सा इससे भड़का कि सत्ताधारी पक्ष ने सामूहिक रुप से विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज को बोलने नहीं दिया। शीघ्र ही, अधिकांश विपक्षी दलों का यह मत बना कि जब तक सरकार इन घोटालों की जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति बनाने को तैयार नहीं होती और दोषियों को दण्डित नहीं किया जाता तब तक संसद में और कोई काम नहीं होगा।

सरकार और स्पीकर द्वारा आहूत अनेक बैठकें इस गतिरोध का समाधान करने में असफल रहीं। हालांकि ज्यों ही बजट सत्र नजदीक आने लगा और विपक्ष के साथ सरकार की बैठकें हुई, उससे यह अहसास हुआ कि इन परिस्थितयों में जे0पी0सी0 का गठन एक सही कदम होगा। गत् सप्ताह कुछ प्रमुख पत्रकारों के साथ प्रधानमंत्री का संवाद निराशाजनक रहा। इसमें भ्रष्टाचार पर चिंता कम और नकली गठबंधनीय दवाबों के बारे में ज्यादा जोर दिया गया।

वास्तव में भाजपा इस तथ्य के प्रति सचेत है कि दूसरे दलों के गठबंधन में नीतिगत मामलों में अवरोधी प्रभाव रहता है। पिछले सप्ताह हैदराबाद की एन0डी0ए0 रैली में, मैंने बताया कि वाजपेयी जी के नेतृत्व वाली सरकार की उपलब्धियों में से तीन नए राज्यों – उत्तारांचल, छत्तासगढ, और झारखंड के सहज निर्माण को मैं विशिष्ट उपलब्धि मानता हूं। यदि हमारे गठबंधन की सहयोगी तेलगुदेशम पार्टी राजी होती तो हम काफी आसानी से तेलंगाना राज्य भी बना सकते थे लेकिन हमारे गठबंधन धर्म ने इसकी अनुमति नही दी। लेकिन न तो वाजपेयी सरकार और न ही राज्यों में अन्य एन0डी0ए0 सरकारों को गठबंधन धर्म को ईमानदारी या सुशासन का बहाना या आड़ नहीं बनने दिया गया।

पिछले महीने ‘दि हिन्दू‘ में प्रकाशित सीबीआई के पूर्व निदेशक आर.के. राघवन का लेख यूपीए सरकार द्वारा भ्रष्टाचार से निपटने के घोषित किए ‘एक्शन प्लान‘ के प्रति काफी तीखा प्रतीत होता है। उन्होंने इस तथाकथित प्लान को ‘असफल‘ के रूप में वर्णित किया है। लेख का शीर्षक है ”भ्रष्टाचार के विरूध्द हारती लड़ाई”। राघवन ने सीवीसी थामस को ”सरकार के गले में पड़ा बोझ (एलबेट्राेंस)” के रूप में वर्णित किया है। उन्होंने पूर्व सीवीसी विट्ठल के इस कथन से सहमति प्रकट करते हुए उद्दृत किया है कि भ्रष्टाचार भारत में कम जोखिम और ऊंचे लाभ वाली गतिविधि बन गई है।

तथापि मैं, सीबीआई के एक दूसरे पूर्व निदेशक सी.वी. नरसिम्हन, जिनकी ईमानदारी और कुशाग्र बुध्दि को सर्वज्ञ प्रतिष्ठा प्राप्त है, द्वारा रखे गए प्रस्ताव का समर्थन करता हूं।

नरसिम्हन ने सुझाया है कि सरकार को ‘सार्वजनिक लोगों के अपराधिक दुर्व्यवहार‘ (criminal misconduct of public men) का कानून बनाना चाहिए। वे कहते हैं कि यह कानून भ्रष्टाचार निवारक कानून, 1988 के तहत आने वाले सभी अपराधों के विरूध्द होगा। इसके तहत राजनीतिज्ञ और नौकरशाह भी आएंगे।
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इसी प्रकार विदेशों के टैक्स हेवन्स में काले धन के मुद्दे को भी पूरी शक्ति से आगे बढ़ाए रखना चाहिए। देश, सर्वाच्च न्यायालय में लम्बित राम जेठमलानी की जनहित याचिका को इसकी तार्किक परिणिति तक पहुंचते देखना चाहता है। आज चुनावी कानून के तहत चुनाव लड़ने वाले प्रत्येक प्रत्याशी को अपनी सम्पत्तियां और देनदारियां बतानी पड़ती हैं। विदेशों में जमा भारतीय धन को भारत वापस लाने के मुद्दे को देखते हुए कानून में यह प्रावधान करना चाहिए कि प्रत्येक प्रत्याशी यह शपथ ले कि उसके पास विदेशों में अघोषित सम्पत्ति नहीं है। कानून में सरकार को यह अधिकार देना चाहिए कि यदि ऐसी सम्पत्ति सरकार को पता चलती है तो वह उसे जब्त कर सके।

इसी तरह का प्रावधान सभी मंत्रियों, सांसदों और पार्टी पदाधिकारियों तथा देश के प्रभावशाली वर्ग की विशेष श्रेणी के लोगों पर भी लागू किया जाना चाहिए।

राजा के स्पेक्ट्रम घोटाले में सी.ए.जी. द्वारा लगाए गए अनुमान 1 लाख 76 हजार करोड़ रूपए की चपत से देश को हतप्रभ कर दिया है। यदि ग्लोबल फाइनेंशियल इंटीग्रेटि द्वारा विदेशों के टैक्स हेवन्स में ले जाए गए भारतीय धन का मूल्यांकन बीस लाख पिचहत्तर हजार करोड़ रूप्ए लगभग बैठता है तो कल्पना की जा सकती है कि यदि सर्वोच्च न्यायालय सरकार को यह सारा धन वापस लाने
को बाध्य कर दे तो भारत की गरीबी को मिटाने पर कितना चमत्कारी प्रभाव हो सकता है!

प्रधानमंत्री के इंटरव्यू पर सुर्खियां

मैं इतना बड़ा अपराधी नहीं हूं जितना बताया जा रहा है : प्रधानमंत्री
एक प्रधानमंत्री मीडिया को गपशप के लिए इसलिए नहीं बुलाता क्योंकि उसके प्रधान सचिव ने बताया कि उस सुबह उनका कोई कार्यक्रम नहीं है।: 
प्रधानमंत्री



स्वातंत्र्यवीर सावरकर को शत-शत नमन्---सूर्यप्रकाश


यह धरा मेरी यह गगन मेरा,
इसके वास्ते शरीर का कण-कण मेरा.

इन पंक्तियों को चरितार्थ करने वाले क्रांतिकारियों के आराध्य देव स्वातंत्र्य वीर सावरकर की 26 फरवरी को पुण्यतिथि है. लेकिन लगता नहीं देश के नीति-निर्माता या मीडिया इस हुतात्मा को श्रद्धांजलि देने की रस्म अदा करेंगे. लेकिन चलिए हम तो उनके आदर्शों से प्रेरणा लेने का प्रयास करें. भारतभूमि को स्वतंत्र कराने में जाने कितने ही लोगों ने अपने जीवन को न्योछावर किया था. लेकिन उनमें से कितने लोगों को शायद हम इतिहास के पन्नों में ही दफन रहने देना चाहते हैं. इन हुतात्माओं में से ही एक थे विनायक दामोदर सावरकर. जिनकी पुण्य तिथि के अवसर पर आज मैं उनको शत-शत नमन करता हूँ.
क्रांतिकारियों के मुकुटमणि और हिंदुत्व के प्रणेता वीर सावरकर का जन्म 28 मई, सन 1883 को नासिक जिले के भगूर ग्राम में हुआ था. इनके पिता श्री दामोदर सावरकर एवं माता राधाबाई दोनों ही धार्मिक और हिंदुत्व विचारों के थे. जिसका विनायक दामोदर के जीवन पर व्यापक प्रभाव पड़ा. वीर सावरकर के हृदय में छात्र जीवन से ही ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ विद्रोह के विचार उत्पन्न हो गए थे. छात्र जीवन के समय में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के विचारों से वीर सावरकर ने मातृभूमि को स्वतंत्र कराने की प्रेरणा ली. सावरकर ने दुर्गा की प्रतिमा के समय यह प्रतिज्ञा ली कि- ‘देश की स्वाधीनता के लिए अंतिम क्षण तक सशस्त्र क्रांति का झंडा लेकर जूझता रहूँगा’.
वीर सावरकर ने लोकमान्य तिलक के नेतृत्व में पूना में विदेशी वस्त्रों कि होली जलाकर विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार की घोषणा की. इसके बाद वे लोकमान्य तिलक की ही प्रेरणा से लन्दन गए. वीर सावरकर ने अंग्रेजों के गढ़ लन्दन में भी क्रांति की ज्वाला को बुझने नहीं दिया. उन्हीं की प्रेरणा से क्रांतिकारी मदन लाल धींगरा ने सर लॉर्ड कर्जन की हत्या करके प्रतिशोध लिया. लन्दन में ही वीर सावरकर ने अपनी अमर कृति 1857 का स्वातंत्र्य समर की रचना की. उनकी गतिविधिओं से लन्दन भी काँप उठा. 13 मार्च,191. को सावरकर जी को लन्दन में गिरफ्तार कर लिया गया. उनको आजीवन कारावास की सजा दी गयी. कारावास में ही 21 वर्षों बाद वीर सावरकर की मुलाकात अपने भाई से हुई. दोनों भाई 21 वर्षों बाद आपस में मिले थे, जब वे कोल्हू से तेल निकालने के बाद वहां जमा कराने के लिए पहुंचे. उस समय जेल में बंद क्रांतिकारियों को वहां पर कोल्हू चलाना पड़ता था.
वर्षों देश को स्वतंत्र देखने की छह में अनेकों यातनाएं सहने वाले सावरकर ने ही हिंदुत्व का सिद्धांत दिया था. स्वातंत्र्य वीर सावरकर के बारे में लोगों के मन में कई भ्रांतियां भी हैं. लेकिन इसका कारण उनके बारे में सही जानकारी न होना है. उन्होंने हिंदुत्व की तीन परिभाषाएं दीं-
(1)- एक हिन्दू के मन में सिन्धु से ब्रहमपुत्र तक और हिमालय से कन्याकुमारी तक संपूर्ण भौगौलिक देश के प्रति अनुराग होना चाहिए.
(2)- सावरकर ने इस तथ्य पर बल दिया कि सदियों के ऐतिहासिक जीवन के फलस्वरूप हिन्दुओं में ऐसी जातिगत विशेषताएँ हैं जो अन्य देश के नागरिकों से भिन्न हैं. उनकी यह परिभाषा इस बात की परिचायक है कि वे किसी एक समुदाय या धर्म के प्रति कट्टर नहीं थे.
(3)- जिस व्यक्ति को हिन्दू सभ्यता व संस्कृति पर गर्व है, वह हिन्दू है.
स्वातंत्र्य वीर सावरकर हिंदुत्व के प्रणेता थे. उन्होंने कहा था कि जब तक हिन्दू नहीं जागेगा तब तक भारत की आजादी संभव नहीं है. हिन्दू जाति को एक करने के लिए उन्होंने अपना समस्त जीवन लगा दिया. समाज में व्याप्त जातिप्रथा जैसी बुराइयों से लड़ने में उन्होंने महत्वपूर्ण योगदान दिया. सन 1937 में सावरकर ने कहा था कि-
”मैं आज से जातिओं की उच्चता और नीचता में विश्वास नहीं करूँगा, मैं विभिन्न जातियों के बीच में विभेद नहीं करूँगा, मैं किसी भी जाति के व्यक्ति के साथ भोजन करने को तत्पर रहूँगा. मैं अपने आपको केवल हिन्दू कहूँगा ब्राह्मण, वैश्य या क्षत्रिय नहीं कहूँगा”. विनायक दामोदर सावरकर ने कई अमर रचनाओं का लेखन भी किया. जिनमें से प्रमुख हैं हिंदुत्व, उत्तर-क्रिया, 1857 का स्वातंत्र्य समर आदि. वे हिन्दू महासभा के कई वर्षों तक अध्यक्ष भी रहे थे. उनकी मृत्यु 26 फरवरी,1966 को 22 दिनों के उपवास के पश्चात हुई. वे मृत्यु से पूर्व भारत सरकार द्वारा ताशकंद समझौते में युद्ध में जीती हुई भूमि पकिस्तान को दिए जाने से अत्यंत दुखी थे. इसी दुखी मन से ही उन्होंने संसार को विदा कह दिया. और क्रांतिकारियों की दुनिया से वह सेनानी चला गया. लेकिन उनकी प्रेरणा आज भी हमारे जेहन में अवश्य होनी चाहिए केवल इतने के लिए मेरा यह प्रयास था कि उनके पुण्यतिथि पर उनके आदर्शों से प्रेरणा ली जाये. स्वातंत्र्य वीर सावरकर को उनकी पुण्यतिथि पर उनको शत-शत नमन्…

कुटिल कणिक की राह पर चल रहे दिग्विजय सिंह--पवन कुमार अरविंद


महाभारत कालीन हस्तिनापुर में महाराज धृतराष्ट्र का एक सचिव था, जिसका नाम था कणिक। उसकी विशेषता यह थी कि वह कुटिल नीतियों का जानकार था और धृतराष्ट्र को पांचों पांडवों के विनाश के लिए नित नए-नए तरकीब सुझाया करता था। महाराज ने उसे इसीलिए नियुक्त भी कर रखा था। इसके सिवाय उसकी और कोई विशेषता नहीं थी, जो राज-काज के संचालन में धृतराष्ट्र के लिए उपयोगी हो।

महाराज ने उसका वेतन और भत्ता भी ज्यादा तय कर रखा था। इसके अलावा उसकी सारी सुविधाएं उसके समकक्ष सभी राज-कर्मचारियों से ज्यादा थी। धृतराष्ट्र ने उसको हर प्रकार से छूट दे रखी थी। यानी उसके केवल सात खून ही नहीं; बल्कि सारे खून माफ थे। वह जो कुछ भी करता, धृतराष्ट्र उसकी खूब तारीफ करते थे।

अन्ततः उसको मिली सारी विशेष सुविधाएं व्यर्थ ही साबित हुईं। क्योंकि उसकी एक भी तरकीब पांडवों के विनाश के लिए काम न आ सकी। कणिक ने ही पाण्डवों को मारने के लिए वारणावत नगर में लाक्षागृह के निर्माण का सुझाव दिया था। जब उसके इस सुझाव का पता दुर्बुद्धि दुर्योधन, कर्ण और दुःशासन; आदि को लगा, तो उन लोगों ने इस सुझाव को जल्द ही अमल में लाने के लिए मामा शकुनि के माध्यम से धृतराष्ट्र को मनाने के प्रयास शुरु कर दिए थे। हालांकि उस धधकते लाक्षागृह से माता कुंती सहित पांचों पाण्डव सकुशल निकलने में सफल हुए।

खैर! जो हुआ सो हुआ। अन्ततः पाण्डवों को मारने की सारी तरकीब असफल साबित हुई। इसके बाद क्या हुआ यह सभी जानते ही हैं। महाभारत युद्ध में कौरवों का विनाश हो गया। यानी धर्म व सुव्यवस्था की विजय हुई और अधर्म व कुव्यवस्था का नाश हुआ। अर्थात- दूसरों का अहित चाहने वालों का विनाश हुआ। यही है महाभारत की कथा।

वारणावत नगर का लाक्षागृह कांड कुरु कुटुम्ब का वह जीता-जागता षड्यंत्र था जो अनेक क्रूरतम राज-षड्यंत्रों की सारी सीमाएं पार कर चुका था। वह कोई सामान्य घटना नहीं थी। मानवीयता की भी सारी सीमाएं पार कर देने वाली घटना थी। यह सारा षड्यंत्र हस्तिनापुर की सत्ता को दीर्घकाल तक हथियाए रखने के लिए चलाया जा रहा था।

हालांकि वर्तमान भारतीय संदर्भ में कणिक की चर्चा करने का मेरा औचित्य केवल कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह की तुलना करना भर ही है। इसके लिए मेरे पास कणिक के सिवाय और कोई उदाहरण नहीं है जो दिग्विजय सिंह पर सटीक बैठे। कणिक और दिग्विजय में कई मामलों में काफी समानता है। उनकी हर गलत बयानी को कांग्रेस सुप्रीमो सोनिया गांधी माफ कर देती हैं। उनको कुछ भी बोलने की पूरी छूट है। वह सबसे ऊपर हैं। कांग्रेस में सोनिया-राहुल को छोड़कर एक वही ऐसी शख्सियत हैं जिन पर पार्टी अनुसाशन का डंडा काम नहीं करता। पार्टी में उनके खिलाफ कोई शख्स बोलने की हिमाकत भी नहीं कर सकता। क्योंकि वह पार्टी सुप्रीमो के काफी खासम खास हैं। अतः उनके खिलाफ बोलकर कोई अपने कमीज की बखिया क्यों उधड़वाए ?

इस देश में जितने भी विवादित विषय हैं, उन सभी विषयों पर दिग्विजय अपने ‘कणिकवत कुटिल विचार’ प्रकट कर चुके हैं। इसके अलावा भी वह नित नए-नए विवादित विषयों की खोज-बीन में लगे रहते हैं। और उन विषयों पर बोल-बोलकर अपनी भद्द पिटवाते रहते हैं।

अभी हाल ही में अरुणाचल प्रदेश के अरुणाचल पूर्वी संसदीय सीट से कांग्रेसी सांसद निनोंग एरिंग ने योग गुरु स्वामी रामदेव को ब्लडी इंडियन तक कह डाला था। योग गुरु की गलती मात्र यही थी कि वह राज्य के पासीघाट में आयोजित योग शिविर में जुटे प्रशिक्षणार्थियों को भ्रष्टाचारी कांग्रेस के काले कारनामे का बड़े ही मनोहारी ढंग से वर्णन कर रहे थे। ठीक उसी वक्त सांसद महोदय आ धमके और उन्होंने योग गुरु के साथ जमकर गाली-गलौज की। स्वामी रामदेव के सहायक ने बताया- सांसद ने असंसदीय भाषा का इस्तेमाल करते हुए बाबा से कहा कि वह राज्य में चला रही भ्रष्टाचार विरोधी अपनी मुहिम बंद कर दें, वरना नतीजा अच्छा नहीं होगा। सबसे आश्चर्य की बात यह है कि कांग्रेस आलाकमान ने उस सांसद के खिलाफ कोई कार्रवाई तक करना उचित नहीं समझा।

विवादित विषय हो तो भला दिग्विजय सिंह कैसे चुप रहें। अतः उन्होंने इस विवाद की बहती नदी में हाथ धोना शुरु कर दिया। उन्होंने योग गुरु से सवाल किया कि भ्रष्टाचार की बातें करने वाले रामदेव को अपनी सम्पत्ति का हिसाब देना चाहिए। ध्यातव्य है कि स्वामी रामदेव पिछले कई महीनों से भ्रष्टाचार के खिलाफ देश भर में जनजागरण अभियान चला रहे हैं। अपने इसी अभियान के तहत योग गुरु अरुणाचल में थे।

दिग्विजय के रवैये से ऐसा लगता है कि उन्होंने हिंदुत्वनिष्ठ संगठनों, साधु-संतों और देशभक्तों को बदनाम करने का ठेका ले रखा है। यहां तक कि वे दिल्ली के बाटला हाउस मुठभेड़ में आतंकियों की गोली से शहीद मोहन चन्द शर्मा जैसे बहादुर सिपाही की शहादत पर भी प्रश्चचिन्ह उठाने से बाज नहीं आए। वह आजमगढ़ जिले के संजरपुर में आतंकी गतिविधियों में संलिप्त लोगों के घर जा कर उन्हें प्रोत्साहित करने से भी नहीं चूके। यही नहीं उन्होंने 26/11 मुम्बई हमलों में शहीद महाराष्ट्र के तत्कालीन एटीएस प्रमुख हेमंत करकरे की शहादत पर भी प्रश्नचिन्ह उठाने की कोशिश की थी। लेकिन स्वर्गीय करकरे की विधवा श्रीमती कविता करकरे ने दिग्विजय की जमकर खिंचाई की थी।

वैसे दिग्विजय के संदर्भ में इस बात की भी खूब चर्चा चलती है कि मुस्लिम मतों को बटोरने के लिए सोनिया गांधी ने उनको मुक्त-हस्त कर दिया है। दिग्विजय भी सोनिया के इस सम्मान का बदला अपने क्षत्रिय मर्यादा की कीमत पर चुकाने के लिए आमादा दिखते हैं। यहां तक कि वह अपनी सारी लोकतांत्रिक मान-मर्यादाएं भी भूल चुके हैं। जो मन में आया वही आंख मूदकर बोल देते हैं। मीडिया भी उनके बयान को खूब तरजीह देता है। यदि उनका यही रवैया रहा तो वह दिन दूर नहीं जब जनता उनको एक स्वर से मानसिक दिवालिया घोषित कर देगी।

विज्ञान में सौन्दर्य ? क्या बात कर ऱहे हैं !!---विश्व मोहन तिवारी


सत्यं, शिवं, सुन्दरम् तो विज्ञान का मूल्य भी होना चाहिये। यद्यपि मूल विज्ञान का तो केवल सत्य से सम्बन्ध है, क्योंकि वह शुद्ध सत्य की खोज कर रहा है। शिवं तो उसके उपयोग करने वालों के ऊपर निर्भर करता है। और सुन्दरता तो देखने वाले की आँख में होती है? फ़िर भी, विज्ञान सममिति को एक महत्वपूर्ण मूल्य मानती है। और सममिति सौन्दर्य का गुण है. अतएव विज्ञान में सौन्दर्य एक मूल्य है। प्रमेय सिद्ध।
नहीं भाई साहब, इतना सरल नहीं है इस प्रश्न का उत्तर! यदि विज्ञान का उद्देश्य ही सत्य की खोज है तब विज्ञान को सौन्दर्य की चिन्ता क्यों करना चाहिये? मान लें किसी विषय पर सत्य और सौन्दर्य में विरोध आ जाता है, तब? तब क्या जो नियम अधिक सुन्दर है वह सत्य है चाहे व जाँच में खरा न उतर रहा हो?
माना, किन्तु मान लें कि विज्ञान का एक नियम जो सुन्दर है वह भी खरा उतर रहा है और दूसरा जो सुन्दर नहीं है, वह भी खरा उतर रहा है तब तो आप सुन्दर नियम को मानेंगे, न कि असुन्दर नियम को। वैज्ञानिक नियम की सुन्दरता कैसे परिभाषित करेंगे ? मान लीजिये कि वह देखने में सरल है। जी हां, सरलतर नियम को प्राथमिकता दी जाना चहिये। सरल होना तो वांछनीय गुण है किन्तु सुन्दरता और सरलता का निश्चित संबन्ध तो नहीं। आधुनिक कला तो अधिकंशतया सरल नहीं कही जा सकती। आइन्स्टाइन के विशेष सापेक्ष सिद्धान्त को लें, वह सरल तो नहीं है - दिक का कैसे संकुचन होता है और काल का विस्फ़ारण कैसे होता है, यह तो सहज बुद्धि से समझना बहुता ही कठिन है, यदि असंभव नहीं। अर्थात हमें विज्ञान के लिये उसी के परिप्रेक्ष्य में सौन्दर्य की परिभाषा करना चाहिये।
अच्छा तो प्रसिद्ध कवि कीट्स का कथन लें, कितना अच्छा कहा है,' सत्य सुन्दर है, और सौन्दर्य सत्य है। आप को इतना ही जानने की आवश्यकता है। भाई हो सकता है कि काव्य में‌ यह सत्य समझ में आए। किन्तु मुझ जैसे वैज्ञानिक को तो इसका अर्थ लगता है कि विज्ञान सत्य है, अत: विज्ञान सुन्दर है। और मुझे केवल इतना ही जानने की आवश्यकता है। तब मैं कविता क्यों पढ़ूं, या सुन्दर तैलचित्र क्यों देखूं ? आखिर इस सूक्त का क्या अर्थ समझें ?
अरे भाई इसका कुछ अर्थ तो होता होगा। चलें, पता करें। सुन्दरता व्यक्तिपरक अधिक है, वस्तुपरक कम, प्रतियोगिताएं कराने वाले सौन्दर्य विशेषज्ञ शरीर के चाहे जितने माप – ४२-२४-४२ – देते रहें।एक सुन्दर मुख में सममिति तो अत्यावश्यक है, अर्थात मुख के दाहिने भाग और बाएं भाग में एक प्रतिबिम्ब के समान समानता होना चाहिये। यह सममिति जितनी अधिक होगी, उस मुख की सुन्दरता उतनी ही अधिक होगी। और क्या यह सच नहीं है कि चन्द्र के समान मुख अत्यंत सुन्दर माना जाता है, वरन मन्त्रमुग्ध या सम्मोहित करने वाला ! क्योंकि वृत्त की आकृति समतल में सर्वाधिक सममितीय होती है। सममिति सुन्दरता का एक गुण तो है। सुंदरता के पूरे आँकलन के लिये मुख के अंग जैसे नासिका, ओंठ, कान इत्यादि में संतुलन भी देखा जाता है। यह उपांगों का संतुलन तो परम्परा से चालित होता है; यथा कहीं ओंठ मोटे औरे बाहर निकले हुए सुन्दर माने जाते हैं और कहीं पतले ओंठ। यह पारम्परिक मान्यताएं 'वैश्विक' नहीं होतीं, जब कि सममिति वैश्विक होती‌ है। यह भी सच है कि मुख की सममिति इतनी वैश्विक होती‌ है कि कभी उसे और अधिक मह्त्व देने के लिये बालों को असममित शैली‌में बनाया जाता है! और मजे की बात यह है कि किसी कि किसी की सममिति या उपांगों के संतुलन की कोई कमी‌ ही‌ इतनी भा जाती है कि उनके लिये वही व्यक्ति अत्यंत सुन्दर हो जाता है। यह भी दृष्टव्य है कि यह आवश्यक नहीं कि सुन्दर मुख वाले व्यक्ति का हृदय भी दयालु हो, और असुन्दर मुख वाले का क्रूर हो। अर्थात चाक्षुष सौन्दर्य में और व्यक्ति के गुणों में कार्य कारण का सीधा सम्बन्ध होना आवश्यक नहीं। इसके मह्त्वपूर्ण परिणाम हैं। क्या सौन्दर्य उपयोगी है? प्रसिद्ध नाटककार और व्यंगकार आस्कर वाइल्ड ने कहा था, ' सभी कलाएं अनुपयोगी हैं!' किन्तु आज के समय में शारीरिक सौन्दर्य (डिब्बों(पैकेजिंग) का सौन्दर्य भी) का उपयोग बाज़ार में अनावश्यक वस्तुओं को बेचने में बहुत उपयोगी है,। क्या कोयला अधिक सुन्दर है या हीरा? स्पष्ट है कि सौन्दर्य तथा उपयोगिता का सीधा सम्बन्ध नहीं है। अर्थात चाक्षुष सौन्दर्य के तर्क को वैज्ञानिक सिद्धान्तो पर नहीं लगाया जा सकता, क्योंकि यह अमूर्त और बौद्धिक होते हैं।विज्ञान में सममिति शब्द का चाक्षुष सममिति से कुछ और ही अर्थ होना चाहिये।
पिकासो ने असममित तथा विकृत चेहरों तथा शरीरों का उपयोग युद्ध की विभीषिका की अभिव्यक्ति के लिये 'ग्युएर्निका' तैलचित्र में बखूबी किया है, और 'ले दैम्वाज़ैल दविनियां' में वेश्याओं पर किये अमानवीय व्यवहार की अभिव्यक्ति के लिये किया है। यह तो कला के नियमों के क्षेत्र की‌ बात है। चित्रों में सुंदरता के लिये रेखा, रंग, प्रकाश–छाया, अंग तथा उपांगों, तथा संरचना में कलात्मक संतुलन आवश्यक है। और तब वह सुंदर चित्र अपने 'रूप' द्वारा अपनी अभिव्यक्ति के कार्य में सफ़ल होता है। अर्थात कला के क्षेत्रमें रूप तथा कथ्य में गहरा संबन्ध होता है। क्या हम रूप (सौन्दर्य) तथा कथ्य के इस संबन्ध की समझ को विज्ञान के क्षेत्र में ले जा सकते हैं? ना और हां।
ना, क्योंकि विज्ञान 'चाक्षुष' विषय नहीं है, यद्यपि चक्षुओं का प्रयोगों में पूरा पूरा उपयोग होता है, क्योंकि विज्ञान तो प्रकृति की घटनाओं को समझने समझाने के लिये शब्दों तथा गणितीय भाषा में अभिव्यक्त करता है। हां, यदि हम सममिति को वैज्ञानिक सिद्धान्तों की प्रक्रियाओं पर लागू करें। वैज्ञानिक सिद्धान्त की प्रक्रियाएं किस अर्थ में सममित हो सकती हैं? यदि कोई सिद्धान्त, जैसे कि गुरुत्वाकर्षण सिद्धान्त यदि पृथ्वी पर और अंतरिक्षी पिण्डों चन्द्र, बृहस्पति, सूर्य, अल्फ़ा सैन्टारी, आकाशगंगा या 'अश्व नीहारिका पर एक ही अर्थ में लागू होता है, तब ऐसे सिद्धान्त को 'दिक में स्थानांतरण' के संदर्भ में सममित कहेंगे। सर्वप्रथम न्यूटन ने इस सिद्धान्त को समझा और परिभाषित किय था, जिसके बल पर संतरिक्षी पिण्डों ( हैवैन्स) तथ इस भूतल पर वही गुरुत्वबल का नियम कार्य करता है। इसने हमारी ब्रह्माण्ड की समझ को सरल कर दिया। कितना मह्त्वपूर्ण सिद्धान्त है, किन्तु सुन्दर ? क्या हम ऐसे विश्व की कल्पना कर सकते हैं कि जिसमें गुरुत्व सिद्धान्त अलग स्थानों पर अलग। कार या विमानों के आविष्कार की तो बात ही न करें। कितना भ्रम होगा हमें गतियां तथा वेगों को समझने में ! शायद उतना ही जितना कि धर्म निरपेक्षता समझने में आज भारतीयों को हो रहा है जो कितनी विकृतियां फ़ैला रहा है।
क्या गुरुत्व सिद्धान्त काल में स्थानांतरण में भी सममित है? जी हां, जो गुरुत्व सिद्धान्त कल लगता था, वही आज लगता है और कल भी लगेगा (जहां तक हम समझ सकते हैं)। आइन्स्टाइन के क्रान्तिकारी सूत्र, यथा आपेक्षिक सिद्धान्त या E = mc2 भी इसी तरह काल में सममित हैं। यदि ऐसे विज्ञान के मूल सिद्धान्त सममित न हों तब हम प्रकृति की कार्य शैली को नहीं समझ पाएंगे। क्या आश्चर्य कि आइन्स्टाइन ने कहा था कि यह सुखद आश्चर्य है कि ब्रह्माण्ड के कार्य कलाप हमारे समझ में आते हैं। यह तो ठीक है कि e= mc2 सूत्र बहुत ही छोटा, सरल और शक्तिशाली है, किन्तु इन कारणों से इस तरह की सममिति को सुन्दर तो नहीं कह सकते ! ऐसे सूत्रों और अन्य वैज्ञानिक सिद्धान्तों की सममिति ब्रह्माण्ड को बुद्धिगम्य बनाती है, बहुत ही उपयोगी हैं, और मन्त्रमुग्ध भी करती हैं, आप इऩ्हें सुन्दर कहें या न कहें। सरलता और लघुता इऩ्हें और भी अधिक उपयोगी बनाती हैं।
समबाहु त्रिभुज, वर्ग, घन,वृत्त और गोल में सममिति हैं; अर्थात समबाहु त्रिभुज को यदि हम ६०० से घुमाएं तब वह त्रिभुज बिलकुल पहले जैसा दिखेगा । इसी तरह वर्ग और घन को ९०० , वृत और गोल को कितने अंश भी घुमाएं वे बिलकुल पहले जैसे दिखेंगे। अर्थात जब हम किसी वस्तु या सूत्र पर कोई क्रिया करें, जैसे कि ऊपर घुमाने की क्रिया की थी, और वह बिलकुल पहले जैसा व्यवहार करे, तब उस वस्तु में सममिति का गुण है। इसी तरह यदि किसी वैज्ञानिक सूत्र या सिद्धान्त में हम कोई प्रक्रिया करें, जैसे कि हम दिक में स्थानान्तरण करें और वह सिद्धान्त वैसे ही कार्य करे तब उस वैज्ञानिक सिद्धान्त में सममिति है। वैज्ञानिक सिद्धान्तों के संदर्भ में अनेक प्रकार की सममितियां हैं, यथा, दिक में स्थानांतरण, कालांतरण, किसी कोण से घुमाना, सरल रेखा में समवेग, काल का उत्क्रमण (भूतकाल में जाना), दिक में परावर्तन, पदार्थ और प्रतिपदार्थ, क्वाण्टम मैकैनिकल फ़ेज़ आदि।
सरलरेखा में समवेग के संदर्भ में सममिति का एक उदाहरण रुचिकर होगा। विज्ञान के नियम दो विभिन्न वाहनों में जो भिन्न किन्तु समवेग से गतिमान हैं, नहीं‌ बदलेंगे। यह तो सहज ही हमें सही‌ लगता है - गुरुत्वसिद्धान्त उन दोनों वाहनों में समान ही लगेगा। किन्तु विज्ञान तो किसी‌ भी अवधारणा को प्रमाणित करने में विश्वास करता है। एक सरल आपेक्षिक वेग का नियम लें - यदि एक वाहन का भूमिस्थित अवलोकनकर्ता की अपेक्षा स्थिर वेग V (वी) है। उस वाहन में स्थित एक व्यक्ति एक गेंद उसी वाहन की दिशा में स्थिर वेग U (यू) से फ़ेकता है, तब उस गेंद का उस अवलोकनकर्ता के अपेक्षा जो वेग होगा वह दोनों के अर्थात यू (U) + वी (V) योग के बराबर होगा। यह नियम सहज तो लगता है किन्तु इसे वैज्ञानिक दृष्टि से पश्चिम में सबसे पहले गैलीलेओ ने लिखा था। अब वाहनस्थित वह व्यक्ति, बजाय गेंद के, एक टार्च से उसी दिशा में प्रकाश का अंशु फ़ेकता है; प्रकाश अंशु का स्थिर वेग 'सी' ( c ) है। अब भूस्थित उस अवलोकन कर्ता को वह प्रकाश का अंशु सी + वी (c+V) वेग से गमन करता दिखाई देना चाहिये। माइकैलसन -मोर्ले द्वय ने यह प्रयोग बहुत ही सूक्ष्म परिशुद्धता से किया था। किन्तु उस प्रकाश अंशु का वेग हमेशा मात्र 'c' ही पाया गया। उस समय के वैज्ञानिक जगत को यह देखकर बहुत बड़ा धक्का लगा क्योंकि गैलीलेओ के आपेक्षिक सिद्धान्त में उनका अटूट विश्वास था और तब तक हमेशा सही पाया गया था। उन्हें ईथर के अस्तित्व पर भी संदेह हुआ। और जेम्स मैक्सवैल के क्रान्तिकारी सूत्रों पर भी संदेह हुआ। प्रसिद्ध वैज्ञानिक लोरेन्ट्ज़ ने एक ऐसा गणितीय रूपान्तरण खोजा जिसने यह समस्या सुलझा दी। उनकी इस प्रक्रिया के अनुसार प्रकाश का वेग c यद्यपि c +Vमें बदलता था, किन्तु दिक के संकुचन तथा काल के विस्फ़ारण के कारण मात्र c ही दिखाई देता था। वैज्ञानिक जगत बहुत प्रसन्न हुआ, जो कि नहीं होना था। क्योंकि लोरेन्ट्ज़ का कार्य केवल गणितीय जादू था, उसके पीछे कोई वैज्ञानिक सिद्धान्त नहीं था, वह तो बाद में आइन्स्टाइन ने दिया जिससे वे विश्व प्रसिद्ध क्रान्तिकारी वैज्ञानिक सिद्ध हुए। आइन्स्टाइन ने यह स्वयंसिद्ध सत्य माना कि प्रकाश का वेग c सी ब्रह्माण्ड में एक अचर है, जो बदलता नहीं है। अब वह गैलीलेओ का आपेक्षिकी सद्धान्त आइन्स्टाइन आपेक्षिकी सिद्धान्त के नाम से जाना जाता है। इस तरह हम देखते हैं कि सिद्धान्तों की सममिति प्राकृतिक घटनाओं को समझाने के साथ नए सिद्धान्तों के जन्म की भी प्रेरणा बन सकती है।
प्रकृति इतनी सममित क्यों है?
अरे भाई विज्ञान के पास अंतिम क्यों के उत्तर नहीं हैं। ब्रह्माण्ड में एक तरह का एकत्व है तो है, और इसलिये उसके नियम या सिद्धान्त सममित हैं।
ब्रह्माण्ड में एक तरह का एकत्व क्यों है?
इसके उत्तर के लिये आपको दार्शनिकों, विशेषकर उपनिषद के ज्ञाताओं, के पास जाना पड़ेगा।अद्वैत दर्शन कहता है ब्रह्माण्ड में एकत्व है क्योंकि वह एक ब्रह्म से उद्भूत है, वरन वही उसी ब्रह्म का प्रसार है, उसी अव्यक्त का, उसी एक का व्यक्त रूप है। वही एक अनेक बन गया है, एकमेव अद्वितीयम्।एकत्व होना ही है।
अब तो आप रहस्यवाद पर उतर आए।
आप भी इस एकत्व की अनुभूति कर सकते हैं। वह रहस्य इसलिये नहीं है कि हम उसे जान नहीं सकते, वरन इसलिये है कि उसे जानने के बाद भी उसका वर्णन नहीं कर सकते।
विज्ञान में सममिति है और इसलिये सौंदर्य भी है। वह न केवल है, वरन आवश्यक है, और हमारे लिये वरदान है। विज्ञान का सौन्दर्य वास्तव में ब्रह्माण्ड का सौन्दर्य है। ब्रह्माण्ड का सौन्दर्य या विज्ञान का सौंदर्य दिखने का नहीं है वरन सिद्धान्तों के वैश्विक होने का है। क्या हम विज्ञान के सौन्दर्य से कुछ सीख सकते हैं कि हम मात्र दिखने या दिखवट पर न जाएं, वरन गुणों और कार्यों के सौन्दर्य का सम्मान करें ?

Wednesday, February 23, 2011

PENCIL AND ERASER STORY (Amazing)

This is an imaginary conversation between a Pencil and an Eraser.

Pencil:    I am sorry.

Eraser:    For what ? You did not do anything wrong.

Pencil:    I am sorry because you get hurt because of me. Whenever I made a mistake,
              you are always there to erase it. But as you make my mistakes vanish, you
              lose a part of yourself. You get smaller and smaller each time.

Eraser:    That is true. But I do not really mind. You see, I was made to do this. I was
               made to help you whenever you do something wrong. Even though one day,
               I know I will be gone and and you will replace me with a new one, I am
               actually happy with my job. So please, stop worrying, I hate seeing you sad.



I found this conversation between the pencil and the eraser very inspirational. Parents are
like the eraser whereas their children are the pencil. They are always there for their children,
cleaning up their mistakes. Sometimes along the way, they get hurt, and become smaller/
older, and eventually pass on.


Though their children will eventually find someone new (spouse), but parents are still happy
with what they do for their children, and will always hate seeing their precious ones worrying,
or sad. All my life, I have been the pencil. And it pains me to see the eraser that is my parents
getting smaller each day. For I know that one day, all that I am left with would be eraser shavings
and memories of what I used to have.

"We never know the love of our parents for us till we have become parents."

Tuesday, February 22, 2011

पश्चिम की गंदी सोच


हौवर्ड ब्लूम विश्वप्रसिद्ध सम्मानित उद्योगपति एवं लोकप्रिय विचारक हैं, जिनके ३ क्रान्तिकारी ग्रन्थ विश्व विख्यात हैं : १. 'द लूसिफ़र प्रिंसिपल : ए साइन्टिफ़िक एक्सपिडीशन इन टु द फ़ोर्सैज़ आफ़ हिस्टरी; २. ग्लोबल ब्रेन : द एवाल्यूशन आफ़ मास माइन्ड फ़्राम द बिग बैन्ग टु द 21स्ट सैन्चुरी; एवं ३. 'द जीनियस आफ़ द बीस्ट'। वे 'प्रोडिजी' या विलक्षण प्रतिभाशाली व्यक्ति हैं। उनके विचारों को समझना आवश्यक है क्योंकि वे भूतकाल तथा भविष्यकाल के लैन्सों से वर्तमान को देखना जानते हैं।
उनका एक प्रसिद्ध लेख है, “ पुटिंग सोल इन द मशीन" जिसमें वे दावा करते हैं कि ओसामा बिन लादैन आधुनिक संस्कृति, अर्थात विचारों की स्वतंत्रता, मानवाधिकार, सैकयुलरिज़म, महिलाओं के अधिकार, समलैन्गिकों के अधिकार आदि, पर आक्रमण कर रहा है। अत हम सभी को जिहाद के विरोध में लड़ने के लिये तैयार रहना चाहिये।
ब्लूम आगे कहते हैं, “हमें बतलाया जाता है कि धनी मानी व्यक्ति पैसा लूटने के लिये कृत्रिम इच्छाएं पैदा करते हैं, . . . हमें गुलाम खरीददार बनाने के लिये उद्योगपति दिन रात काम करते हैं. . . और इसमें कुछ सत्य तो है . . किन्तु समस्या का मूल पाश्चात्य जीवन की टर्बाइनों में‌ नहीं, .. वरन हमारे लैंस अर्थात दृष्टिकोण में‌ है . . इस अद्भुत ग्रह को यह विचारहीन लोभ का लंपटपन वाला उपभोक्तावादी नष्ट करने पर नहीं तुला हुआ है; यह सर्वोत्तम सृजनशील जैव एंजिन है जिसमें ऐसी आदर्शमय संभावनाएं हैं जो पहले कभी नहीं देखी‌ गईं।"
यहां ब्लूम के लैन्स का रंग गलत है। यद्यपि एक व्यंग्यात्मक रूप में वे ठीक कह रहे हैं - कि समस्या लैंस में है, बस अंतर इतना ही कि उनका ही लैंस गलत है। यह विचार या विश्वास, कि भरपेट भोग करने से सुख मिलता है, ही गलत है। भोग की इच्छा पूरी करने से भोग की और इच्छाएं उत्पन्न होती‌ हैं,उनसे पेट नहीं भर सकता। अंतत: भोगवादी इच्छाओं के पूरी‌ न होने से अथवा इंद्रियों के दुर्बल होने से हताश हो जाता है। और इस शस्य श्यामला पृथ्वी को वह उजाड़ रहा है जिससे बच्चों का भविष्य अंधकारमय ही दिख रहा है। अंत में, यद्यपि बहुत देर बाद, वह समझ जाता है कि उसने जीवन मृगतृष्णा की तरह बिता दिया।
ब्लूम आगे लिखते हैं, “ लगभग प्रत्येक धर्म (फ़ेथ) ईसाई, इस्लाम, बौद्ध, और मार्क्सिज़म घोषणा करते हैं कि वे दलित और गरीबों को सुखी‌ बनाएंगे । किन्तु केवल पूँजीवाद ही इस वचन को पूरा करने में सफ़ल हुआ है।" मजे की‌ बात है कि नोबेल पुरस्कृत अमैरिकी मनोवैज्ञानिक डैनी कान मैन कहते हैं कि अमैरिकी‌ नहीं जानते कि सुख क्या है!! इसका अर्थ यह तो निश्चित ही हुआ कि भोगवाद में सुख नहीं‌ है। पूँजीवादी अमैरिका में गरीब, जो अन्य देशों के गरीबों से अधिक धनी‌ होता है, अधिक दुखी‌ होता है क्योंकि वह अमीरों को अपनी तुलना में इतना अधिक भोग लेते हुए देखता है। और दूसरी बात कि मनुष्य अब अपनी इच्छाओं का स्वैच्छिक गुलाम हो जाता है, तब गुलाम को सुख कहां !
ब्लूम पुन: घोषित करते हैं, “जब कि अर्धमृत पूँजीवाद ने मानव को भारी मात्रा में नई शक्ति दी‌ है, तदनुभूति (एम्पैथी), भावाकुलता तथा तर्क की त्रयी‌ द्वारा चालित पूंजीवाद नए और बड़े आश्चर्य प्रदान कर सकता है।" यह भी मूलभूत सत्य है कि पूँजीवाद में सबसे पहला लक्ष्य 'लाभ' होता है, अन्य मूल्य इसके बाद हाशिये पर ही आते हैं। और यदि अन्य मूल्य लाभ के पहले आ गए तब वह पूँजीवाद नहीं। अर्थात वे स्वीकार करते हैं कि पूँजीवाद सुख देने में असमर्थ है। इसके बाद वे एक और घोषणा करते हैं, “ पश्चिम में हम यह मंत्र मानकर जीवन जीते हैं कि हम एक दूसरे को उठाते हुए कार्य करें, और हम यह वैश्विक स्तर पर करते हैं।" यह तो मानी हुई बात है कि अधिकतर आदमी अपने को दूसरों से अच्छा ही मानता है; किन्तु यहां तो ब्लूम महोदय ने झूठ की सीमा ही पार कर दी। पूंजीवाद तो अपना लाभ सर्वप्रथम देखता है, दूसरे को उठाने की‌ बात तो अपना लाभ बढ़ाने के उद्देश्य से ही आएगी। स्वार्थ तो पूंजीवाद का मूल मंत्र है।
विश्व बैंक द्वारा प्राप्त आँकड़े दिखलाते हैं कि " विश्व के सर्वाधिक समृद्ध देश में गरीबों तथा धनिकों में सबसे बड़ा अंतर है, और यह अंतर समय तथा प्रौद्योगिकी से साथ बढ़ता ही जा रहा है।" यह आँकड़े ब्लूम साहब के झूठ को दिन के प्रकाश के समान चमका रहे हैं !
ब्लूम साहब आगे कहते हैं, “ भोगवाद जो दुष्ट दिखता है वह वास्तव में‌ है नहीं। मशीन में अपनी आत्मा डालकर हम और आप पूँजीवाद को नया जन्म देकर मानव की संभावनाएं और बढ़ा सकते हैं। इसका अर्थ तो रहस्यमय है। मेरी समझ में तो यही आता है कि पूँजीवादी की आत्मा तो और और भोग, अन्तहीन भोग ही‌ माँगती है।
वे अपनी पुस्तक 'द जीनियस आफ़ द् बीस्ट' में भावाकुल होकर ज़ोर से घोषणा करते हैं, “ मां प्रकृति तो एक खूनी कुतिया है। वह घोर विपत्तियों की मां है जननी है! उसमे हमें 'गार्डन आफ़ ईडन' या आदिम स्वर्ग शायद ही कहीं दिया हो . . . . विकास का ध्येय ही प्रकृति के एक कदम आगे रहना है, प्रकृति के नियमों को तोड़ना है। इसीलिये टिकाऊ विकास की जड़ों में समस्याएं ही हैं, और अपनी‌ निश्चित हार। यही‌ हमारी‌ चुनौती है। हमें तो बाढ़ में, सूखे में और नवीन हिमयुग में पर्याप्त अनाज पैदा करना है। मूल अनिवार्यता है कि इस गृह के प्रत्येक परमाणु को हमें अपने डी एन ए तंत्र की सेवा में नियुक्त करना है, । मां प्रकृति चाहे जितनी घृणित दुर्घटनाएं हम पर ढाए, हमारे डी एन ए अगले बहुल विनाश में बच कर आगे निकल जाएं, । क्या मैं कोरी कल्पना की ऊँची उड़ाने भर रहा हूं !!”
"नहीं। लिथोआट्राफ़्स बैक्टीरिया अब चट्टानों का भोजन बना रही है, एक्स्ट्रीमोफ़ाइल्स बैक्टीरिया गंधक का। यह सूक्ष्म जीव हमें शिक्षा दे रहे हैं कि जो प्रकृति की अवज्ञाकर, नवाचार करते हैं, वही सीमाओं के पार जाते हैं, नवीन समृद्धि को प्राप्त करते हैं।. . . हम इसी तरह प्रकृति की क्षमताओं में वृद्धि करते हैं।"
स्पष्ट ही ब्लूम पर्यावरण के संरक्षण में विश्वास नहीं करते, वरन उससे लड़कर जीवन बचाना चाहते हैं। वे इसके उदाहरण भी देते हैं। 'चेन्जिन्ग वर्ल्ड टैक्नालाजीज़' औद्योगिक तथा कृषीय सहउत्पादों को तेल, गैस, विशेष रसायनों, उर्वरकों आदि में बदलते हैं - कचड़े को स्वर्ण में बदल रहे हैं। देखा जाए तो यह कदम पर्यावरण संरक्षण का ही अगला चरण है, किन्तु ब्लूम के युद्ध में‌ यह पहला कदम है। उऩ्हें पर्यावरण संरक्षण से जो विरोध है, उसे समझना कठिन है, जो अव्यवहारिक भी है, एकांगी भी हैं, किन्तु एकदम पागलपन भी नहीं हैं। प्रकृति का विरोध तो तब करना चाहिये जब हम उऩ्हें ठीक से समझ लें। उनके कथनों को विज्ञान कथाकार विश्लेषण तथा संश्लेषण कर उनका मंथन कर उन में से मक्खन निकाल सकते हैं।

हम अभी भी गुलाम हैं-विश्व मोहन तिवारी


इसमें और आज की स्थिति  में उतना ही अन्तर है जितना कि उस जमाने की प्रौद्योगिकी में और आज की प्रौद्योगिकी‌ में है। आप शायद सहमत न हों, किन्तु थोडा सा गौर तो करें।
आज इस वैज्ञानिक युग में जहां विज्ञान की खोज के प्रकाशन को विद्वानों द्वारा परखा जा सकता है, वहां  इस देश में उसी वैज्ञानिक की पदोन्नति होती‌ है जिसके प्रपत्र विदेशी जर्नल अर्थात यू एस ए और ब्रितानी जर्नलों में प्रकाशित हुए हों ! देशी जर्नल में प्रकाशित होते ही उस प्रपत्र को तीसरे दर्जे का मान लिया जाता है। क्या हम लोग विज्ञान में इतने पिछड़े हैं कि एक प्रपत्र को परख नहीं सकते और हमें विदेशी जर्नल की शरण लेना प,डती है ?  क्योंकि हम अंग्रेज़ी के गुलाम हैं।
यही बात साहित्य पर या विज्ञान कथा पर लागू होता है। यदि विदेशी पत्रिका में कुछ भी प्रकाशित हो जाए तो लोग उत्सव मनाते हैं, और देशी माध्यम में प्रकाशित हो तो उसे घटिया मानते हैं, क्योंकि हम अंग्रेज़ी के गुलाम हैं।उस जमाने में अंग्रेज़ साहब जैसी हिन्दी बोलता था आज हम सब वैसी ही हिन्दी,  उसी शान से, बस शायद थोडी और आधुनिक गुलामी से भरी, बोलते हैं। उस जमाने में हिन्दुस्तानी जितनी शान से अन्ग्रेज़ की सेवा करता था ( फ़ोटोग्राफ़र का कमाल है)
आज हम भी उसी शान से अमेरिकी या ब्रितानी की सेवा करने में अपना गौरव समझते हैं। मेरे एक मित्र की पुत्री अंग्रेज़ी कि पत्रकार थी.  उनके पास विवाह के लिये एक लडके का प्रस्ताव आया। उऩ्होने कहा कि मैं अपनी पुत्री का विवाह उसके साथ कैसे कर सकता हूं, क्योंकि वह तो हिन्दी का पत्रकार है !
हमारे प्रसिद्ध स्कूलों के प्रसिद्ध प्रिन्सिपल विद्यार्थियों को हिन्दी में बातचीत करने पर दण्ड देते हैं, वे छोटे से अपने प्यारे 'इंग्लैण्ड' में रहते हैं; वे शायद सपने में उस अंग्रेज़ साहब को पंखा झल रहे हैं।
अंग्रेज़ी राज के ज़माने से हमारे दिलों में यह सपना बैठ गया, तभी तो अंग्रेज़ी को इस देश की राजभाषा बनाया गया। फ़िर क्या था। बहुतों‌ ने मन्नतें कीं कि मेरा बच्चा भी बस जन्म लेते ही साहब के समान गिटपिट बोलने लगे, और मेरा बेटा भी वहीं वैसे ही साहब -सा बैठकर अपने पैरों कि सेवा करवाए किसी घटिया भाषा बोलने वाले से।
आप शायद अभी भी सहमत न हों, कि हम अभी भी गुलाम हैं; तब मैं समझ जाउंगा कि मैं तो घटिया भाषा में बोल रहा हूं, आप कैसे उसे मान सकते हैं।
-- एयर वाइस मार्शल विश्व मोहन तिवारी, से. नि.

Thursday, February 17, 2011

भारतीय विद्यार्थियों के साथ अमानवीय व्यवहार के लिए माफी मांगें अमेरिकी राष्ट्रपति - डॉ. प्रवीण तोगड़िया


भारतीय विद्यार्थियों की टांगों में इलेक्ट्रॉनिक पट्टे बांध कर अमेरिकी सरकार भारतीय विद्यार्थियों के साथ गुलामों जैसा व्यवहार कर रही है।
जब से बराक हुसैन ओबामा अमेरिका के राष्ट्रपति बने हैं तभी से वे और उनकी सरकार लगातार भारत और भारतीयों को किसी न किसी बहाने अपमानित करने के साथ-साथ उनके साथ अमानवीय व्यवहार करती रही है। सबसे पहले ओबामा ने भारत से होने वाली सभी प्रकार की आउटसोर्सिंग को बंद करने की बात कही, उसके बाद ओहियो राज्य ने भारतीय सूचना संस्थानों का एक प्रकार से बहिष्कार कर दिया। तत्पश्चात् अपनी बहुप्रचारित भारत यात्रा के दौरान ओबामा दम्पति द्वारा यहां फूहड़ नृत्य करना तथा पुन: भारतीयों को अमेरिकीओं की नौकरी छीनने वाला देश बताया। अब जिस प्रकार ट्राई वैली विश्वविद्यालय में भारतीय विद्यार्थियों के साथ अमानवीय व्यवहार किया गया है, वह अत्यंत निन्दनीय है।
जिन भारतीय छात्रों की टांगों में ये इलेक्ट्रॉनिक पट्टे बांधे गये हैं, उन सभी ने विश्वविद्यालय में दाखिला लेते समय वांछित प्रक्रिया का पूरा पालन किया था। उस प्रक्रिया में अमेरिकी अधिकारियों के द्वारा परीक्षा तथा साक्षात्कार आदि की सभी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद ही उन्हें विद्यार्थी वीजा प्रदान किया गया था। इसलिए जब विश्वविद्यालय ने अमेरिकी आव्रजन सेवा अधिकारियों के समक्ष इन विद्यार्थियों के वीजा हेतु जरूरी अन्य दस्तावेज प्राप्त करने के उद्देश्य से उनके दस्तावेज प्रस्तुत किये तो आज सवाल उठाने वाले ये अमेरिकी अधिकारी उस समय कहां थे?
इसी प्रकार अमेरिकी विश्वविद्यालय द्वारा उपलब्ध कराये गये और अमेरिकी आव्रजन अधिकारियों द्वारा सत्यापित दस्तावेज लेकर जब ये छात्र भारत स्थित अमेरिकी दूतावास गये थे तो भारतीय दूतावास ने विश्वविद्यालय की सत्यता और उन दस्तावेजों की प्रामाणिकता की उस समय जांच क्यों नहीं की? इसके बाद जब उन छात्रों ने विश्वविद्यालय में कुछ सेमेस्टर पास किये और मेडिकल बीमे तथा अन्य सेवाओं हेतु आवश्यक राशि का भुगतान किया तो उस समय अमेरिकी अधिकारी कहां थे? इसलिए अब इन भारतीय विद्यार्थियों पर क्यों आरोप लगाया जा रहा है?
ये छात्र तो वास्तव में अमेरिका स्थित अमेरिकी अधिाकारियों की मिलीभगत से ट्राई वैली यूनिवर्सिटी द्वारा की गयी धाोखाधाड़ी के शिकार हुए हैं। दोषी विश्वविद्यालय तथा अपने अधिकारियों की टांगों में ये अपमानजनक पट्टे बांधने की बजाए इन निर्दोष भारतीय विद्यार्थियों की टांगों में पट्टे बांधना पूरी तरह अन्याय और भारतीय विद्यार्थियों के मानवाधिकारों का सरासर उल्लंघन है।
मेरी भारतीय अभिभावकों और विद्यार्थियों से अपील है कि वे विदेशों में पढ़ने का मोह छोडकर भारत स्थित अच्छे शिक्षा संस्थानों में दाखिला लेकर पढ़ाई करने का प्रयास करें। अमेरिकी विश्वविद्यालय भारतीय विश्वविद्यालयों की अपेक्षा बहुत अधिक फीस वसूल करते हैं। इन विद्यार्थियों से ज्यादा फीस लेकर वे वास्तव में अपने अमेरिकी विद्यार्थियों को सस्ती शिक्षा प्रदान करते हैं। भारत सदैव ही बेहतरीन शिक्षा एवं संस्कृति का केन्द्र रहा है। इसलिए भारतीय विद्यार्थियों द्वारा खोखले अमेरिकी स्वप्न देखना उनके स्वयं के लिए ही खतरनाक सिध्द हो रहा है। खासतौर से अमेरिका द्वारा किये इस प्रकार के घिनौने मानवाधिकारों के उल्लंघन के मद्देनजर और अमेरिका की धवस्त हो चुकी अर्थव्यवस्था को देखते हुए इस बात पर गौर करना जरूरी है।
अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को हिन्दू विद्यार्थियों के साथ किये गये इस अमानवीय व्यवहार के लिए तुरन्त मॉफी मांगनी चाहिए तथा उनकी टांगों में बांधे गये इलेक्ट्रॉनिक पट्टों को अविलम्ब हटाया जाए।
इसी के साथ सभी प्रभावित भारतीय विद्यार्थियों को अमेरिका के अन्य अधिकृत विश्वविद्यालयों में दाखिला दिलवाना चाहिए। यदि अमेरिकी सरकार ऐसा करने में असफल रहती है तो विश्व हिन्दू परिषद लोकतांत्रिक तरीके से सभी भारतीयों का आह्वान करेगी कि वे तुरन्त अमेरिकी कंपनियों के बनाये गये उत्पादों का बहिष्कार करना आरम्भ करें।
ऐसे अमेरिकी उत्पादों में शमिल हैं-कॉलगेट टूथपेस्ट, हेड एंड शॉल्डकर शेंपू, ऐरियल एंड टाइड डिटर्जेंट, विस्पर एंड स्टे प्रफी सेनिटरी नेपकिन्स, जॉनसन्स एंड जॉनसन्स बेबी प्रोडेक्टस तथा मेडिकल प्रोडेक्टस, फिजर फार्मा द्वारा बनायी गयी दवाइयां, कोका कोला, केलॉग्स, पेप्सी, जनरल मोटर्स एंड फॉर्ड वाहन, कॉम्पैक, एप्पल, आईबीएम एंड डेल कम्प्यूटर्स, माइक्रोसाफ्ट, बोइंग, डॉमिनॉस एंड पिज्जा हट पिज्जा, स्टारबक्स कॉफी, केएफसी, मॉनसेंटो और दूसरे अनेक उपभोक्ता उत्पाद।
- लेखक ख्यातलब्ध कैंसर सर्जन और विहिप के अन्तरराष्ट्रीय महामंत्री हैं।

Wednesday, February 16, 2011

थी शुभ सुहाग की रात मधुर!!

थी शुभ सुहाग की रात मधुर
मधु छलक रहा था कण कण में
सपने जगते थे नैनों में
अरमान मचलते थे मन में

सरदार मगन मन झूम रहा
पल पल हर अंग फड़कता था
होठों पर प्यास महकती थी
प्राणों में प्यार धड़कता था

तब ही घूँघट में मुस्काती
पग पायल छम छम छमकाती
रानी अन्तःअपुर में आयी
कुछ सकुचाती कुछ शरमाती
मेंहदी से हाथ रचे दोनों
माथे पर कुमकुम का टीका
गोरा मुखड़ा मुस्का दे तो
पूनम का चाँद लगे फ़ीका

धीरे से बढ़ चूड़ावत ने २
रानी का घूँघट पट खोला
नस नस में कौंध गई बिजली
पीपल पत्ते सा तन डोला
अधरों से अधर मिले जब तक
लज्जा के टूटे छंद बंध
रण बिगुल द्वार पर गूँज उठा २
शहनाई का स्वर हुआ मंद

भुजबंधन भूला आलिंगन
आलिंगन भूल गया चुम्बन
चुम्बन को भूल गई साँसें
साँसों को भूल गई धड़कन
सजकर सुहाग की सेज सजी २
बोला न युद्ध को जाऊँगा
तेरी कजरारी अलकों में
मन मोती आज बिठाऊँगा

पहले तो रानी रही मौन
फिर ज्वाल ज्वाल सी भड़क उठी
बिन बदाल बिन बरखा मानो
क्या बिजली कोई तड़प उठी
घायल नागन सी भौंह तान
घूँघट उठाकर यूँ बोली
तलवार मुझे दे दो अपनी
तुम पहन रहो चूड़ी चोली

पिंजड़े में कोई बंद शेर २
सहसा सोते से जाग उठे
या आँधी अंदर लिये हुए(?)
जैसे पहाड़ से आग उठे
हो गया खड़ा तन कर राणा
हाथों में भाला उठा लिया
हर हर बम बम बम महादेव २
कह कर रण को प्रस्थान किया
देखा

जब(?) पति का वीर वेष
पहले तो रानी हर्षाई
फिर सहमी झिझकी अकुलाई
आँखों में बदली घिर आई
बादल सी गई झरोखे पर २
परकटी हंसिनी थी अधीर
घोड़े पर चढ़ा दिखा राणा
जैसे कमान पर चढ़ा तीर

दोनों की आँखें हुई चार
चुड़ावत फिर सुधबुध खोई
संदेश पठाकर रानी को
मँगवाया प्रेमचिह्न कोई
सेवक जा पहुँचा महलों में
रानी से माँगी सैणानी
रानी झिझकी फिर चीख उठी
बोली कह दे मर गैइ रानी

ले खड्ग हाथ फिर कहा ठहर
ले सैणानी ले सैणानी
अम्बर बोला ले सैणानि
धरती बोली ले सैणानी
रख कर चाँदी की थाली में
सेवक भागा ले सैणानि
राणा अधीर बोला बढ़कर
ला ला ला ला ला सैणानी

कपड़ा जब मगर उठाया तो
रह गया खड़ा मूरत बनकर
लहूलुहान रानी का सिर
हँसता था रखा थाली पर
सरदार देख कर चीख उठा
हा हा रानी मेरी रानी
अद्भुत है तेरी कुर्बानी
तू सचमुच ही है क्षत्राणी

फिर एड़ लगाई घोड़े पर
धरती बोली जय हो जय हो
हाड़ी रानी तेरी जय हो
ओ भारत माँ तेरी जय हो !!

Monday, February 14, 2011

वेलेंटाइन डे का सच


बाजार भी बड़ी अजीब चीज है। यह किसी को भी धरती से आकाश या आकाश से धरती पर पहुंचा देता है। यह उसकी ही महिमा है कि भ्रष्टाचारी नेताओं को अखबार के पहले पृष्ठ पर और समाज सेवा में अपना जीवन गलाने वालों को अंदर के पृष्ठों पर स्थान मिलता है। बाजार के इस व्यवहार ने गत कुछ सालों से एक नये उत्सव को भारत में लोकप्रिय किया है। इसका नाम है वेलेंटाइन दिवस।
हर साल 14 फरवरी को मनाये जाने वाले इस उत्सव के बारे में बताते हैं कि लगभग 1,500 साल पहले रोम में क्लाडियस दो नामक राजा का शासन था। उसे प्रेम से घृणा थी; पर वेलेंटाइन नामक एक धर्मगुरु ने प्रेमियों का विवाह कराने का काम जारी रखा। इस पर राजा ने उसे 14 फरवरी को फांसी दे दी। तब से ही यह ‘वेलेंटाइन दिवस’ मनाया जाने लगा।
लेकिन यह अधूरा और बाजारी सच है। वास्तविकता यह है कि ये वेलेंटाइन महाशय उस राजा की सेना में एक सैनिक थे। एक बार विदेशियों ने रोम पर हमला कर दिया। इस पर राजा ने युद्धकालीन नियमों के अनुसार सब सैनिकों की छुट्टियां रद्द कर दीं; पर वेलेंटाइन का मन युद्ध में नहीं था। वह प्रायः भाग कर अपनी प्रेमिका से मिलने चला जाता था। एक बार वह पकड़ा गया और देशद्रोह के आरोप में इसे 14 फरवरी को फांसी पर चढ़ा दिया गया। समय बदलते देर नहीं लगती। बाजार के अर्थशास्त्र ने इस युद्ध अपराधी को संत बना दिया।
दुनिया कहां जा रही है, इसकी चिंता में दुबले होने की जरूरत हमें नहीं है; पर भारत के युवाओं को इसके नाम पर किस दिशा में धकेला जा रहा है, यह अवश्य सोचना चाहिए। भारत तो वह वीर प्रसूता भूमि है, जहां महाभारत युद्ध के समय मां विदुला ने अपने पुत्र संजय को युद्ध से न भागने का उपदेश दिया था। कुन्ती ने अपने पुत्रों को युद्ध के लिए उत्साहित करते हुए कहा था -
यदर्थं क्षत्रियां सूते तस्य कालोयमागतः
नहि वैरं समासाक्ष्य सीदन्ति पुरुषर्षभाः।। (महाभारत उद्योग पर्व)
(जिस कारण क्षत्राणियां पुत्रों को जन्म देती हैं, वह समय आ गया है। किसी से बैर होने पर क्षत्रिय पुरुष हतोत्साहित नहीं होते।)
भारत की एक बेटी विद्युल्लता ने अपने भावी पति के युद्धभूमि से लौट आने पर उसके सीने में कटार भौंक कर उसे दंड दिया और फिर उसी से अपनी इहलीला भी समाप्त कर ली थी। गुरु गोविंद सिंह जी के उदाहरण को कौन भुला सकता है। जब चमकौर गढ़ी के युद्ध में प्यास लगने पर उनके पुत्र किले में पानी पीने आये, तो उन्होंने दोनों को यह कहकर लौटा दिया कि वहां जो सैनिक लड़ रहे हैं, वे सब मेरी ही संतानें हैं। क्या उन्हें प्यास नहीं लगी होगी ? जाओ और शत्रु के रक्त से अपनी प्यास बुझाओ। इतिहास गवाह है कि उनके दोनों बड़े पुत्र अजीतसिंह और जुझारसिंह इसी युद्ध में लड़ते हुए बलिदान हुए।
हाड़ी रानी की कहानी भी हम सबने पढ़ी होगी। जब चूड़ावत सरदार का मन युद्ध में जाते समय कुछ विचलित हुआ, तो उसने रानी से कोई प्रेम चिन्ह मंगवाया। एक दिन पूर्व ही विवाह बंधन में बंधी रानी ने अविलम्ब अपना शीश काट कर भिजवा दिया। प्रसिद्ध गीतकार नीरज ने अपने एक गीत ‘थी शुभ सुहाग की रात मधुर…. ’ में इस घटना को संजोकर अपनी लेखनी को धन्य किया है।
ऐसे ही तानाजी मालसुरे अपने पुत्र रायबा के विवाह का निमन्त्रण देने जब शिवाजी के पास गये, तो पता लगा कि मां जीजाबाई ने कोंडाणा किले को जीतने की इच्छा व्यक्त की है। बस, ताना जी के जीवन की प्राथमिकता निश्चित हो गयी। इतिहास बताता है कि उस किले को जीतते समय, वसंत पंचमी के पावन दिन ही तानाजी का बलिदान हुआ। शिवाजी ने भरे गले से कहा ‘गढ़ आया पर सिंह गया’। तबसे ही उस किले का नाम ‘सिंहगढ़’ हो गया।
करगिल का इतिहास तो अभी ताजा ही है। जब बलिदानी सैनिकों के शव घर आने पर उनके माता-पिता के सीने फूल उठते थे। युवा पत्नियों ने सगर्व अपने पतियों की अर्थी को कंधा दिया था। लैफ्टिनेंट सौरभ कालिया की मां ने कहा था, ‘‘मैं अभिमन्यु की मां हूं।’’ मेजर पद्मपाणि आचार्य ने अपने पिता को लिखा था, ‘‘युद्ध में जाना सैनिक का सबसे बड़ा सम्मान है।’’ लैफ्टिनेंट विजयन्त थापर ने अपने बलिदान से एक दिन पूर्व ही अपनी मां को लिखा था, ‘‘मां, हमने दुश्मन को खदेड़ दिया।’’
ये तो कुछ नमूने मात्र हैं। जिस भारत के चप्पे-चप्पे पर ऐसी शौर्य गाथाएं बिखरी हों, वहां एक भगोड़े सैनिक के नाम पर उत्सव मनाना क्या शोभा देता है ? पर उदारीकरण के दौर में अब भावनाएं भी बिकने लगी हैं। महिलाओं की देह की तर्ज पर अब दिल को भी बाजार में पेश कर दिया गया है। अब प्रेम का महत्व आपकी भावना से नहीं, जेब से है। जितना कीमती आपका तोहफा, उतना गहरा आपका प्रेम। जितने महंगे होटल में वेलेंटाइन डिनर और ड्रिंक्स, उतना वैल्यूएबल आपका प्यार। यही है वेलेंटाइन का अर्थशास्त्र।
वेलेंटाइन की इस बहती गंगा (क्षमा करें गंदे नाले) में सब अपने हाथ मुंह धो रहे हैं। कार्ड व्यापारी से लेकर अखबार के मालिक तक, सब 250 रु0 से लेकर 1,000 रु0 तक में आपका संदेश आपकी प्रियतमा तक पहुंचाने का आतुर हैं। होटल मालिक बता रहे हैं कि हमारे यहां ‘केंडेल लाइट’ में लिया गया डिनर आपको अपनी मंजिल तक पहुंचा ही देगा। कीमत सिर्फ 2,500 रु0। प्यार के इजहार का यह मौका चूक गये, तो फिर यह दिन एक साल बाद ही आयेगा। और तब तक क्या भरोसा आपकी प्रियतमा किसी और भारी जेब वाले की बाहों में पहुंच चुकी हो। इस कुसंस्कृति को घर-घर पहुंचाने में दूरदर्शन वाले भी पीछे नहीं हैं। केवल इसी दिन भेजे जाने वाले मोबाइल संदेश (एस.एम.एस तथा एम.एम.एस) से टेलिफोन कम्पनियां करोड़ों रु0 कमा लेती हैं।
वेलेंटाइन से अगले दिन के समाचार पत्रों में कुछ रोचक समाचार भी पढ़ने का हर बार मिल जाते हैं। एक बार मेरठ के रघुनाथ गर्ल्स कालिज के पास जब कुछ मनचलों ने जबरदस्ती छात्राओं को गुलाब देने चाहे, तो पहले तो लड़कियों ने और फिर वहां सादे वेश में खड़े पुलिसकर्मियों ने चप्पलों और डंडों से धुनाई कर उनका वेलेंटाइन बुखार झाड़ दिया। जब उन्हें मुर्गा बनाया गया, तो वहां उपस्थित सैकड़ों दर्शकों ने ‘हैप्पी वेलेंटाइन डे’ के नारे लगाये।
ऐसे ही लखनऊ के एक आधुनिकवादी सज्जन की युवा पुत्री जब रात में दो बजे तक नहीं लौटी, तो उनके होश उड़ गये। पुलिस की सहायता से जब खोजबीन की, तो वह एक होटल के बाहर बेहोश पड़ी मिली। उसके मुंह से आ रही तीखी दुर्गन्ध और अस्त-व्यस्त कपड़े उसकी दुर्दशा की कहानी कह रहे थे। वेलेंटाइन का यह पक्ष भी अब धीरे-धीरे सामने आने लगा है। इसलिए इस उत्सव को मनाने को आतुर युवा वर्ग को डांटने की बजाय इसके सच को समझायेें। भारत में प्रेम और विवाह जन्म जन्मांतर का अटूट बंधन है। यह एक दिवसीय क्रिकेट की तरह फटाफट प्यार नहीं है।
वैसे वेलेंटाइन का फैशन अब धीरे-धीरे कम हो रहा है। चंूकि कोई भी फैशन सदा स्थायी नहीं रहता। बाजार की जिस आवश्यकता ने देशद्रोही को ‘संत वेलेंटाइन’ बनाया है, वही बाजार उसे कूड़ेदान में भी फंेक देगा। यह बात दूसरी है कि तब तक बाजार ऐसे ही किसी और नकली मिथक को सिर पर बैठा लेगा। क्योंकि जबसे इतिहास ने आंखें खोली हैं, तबसे बाजार का अस्तित्व है और आगे भी रहेगा। इसलिए विज्ञापनों द्वारा नकली आवश्यकता पैदा करने वाले बाजार की मानसिकता से लड़ना चाहिए, युवाओं से नहीं।

Tuesday, February 8, 2011

माछ भात और मनमोहन सिंह का अर्थशास्त्र

देश में मंहगाई जिस बेतहाशा गति से बढ रही है उससे आम आदमी का चिंतित होना स्वभाविक ही है। दरासल मंहगाई से आम आदमी केवल चिंतित ही नही है बल्कि अनेक स्थानों पर जीवन यात्रा के सूत्र उनके हाथांे से छूटते भी जा रहे हैं। जो वर्ग उत्पादन के क्षेत्र में लगा हुआ है, मसलन किसान और मजदूर, महगाई के कारण उनकी हालत बद से बदतर होती जा रही है। यही कारण है पिछले कुछ वर्षो से, नई आर्थिक नीतियों से पटडी न बिठा पाने के कारण आत्महत्या करने वाले मजदूरों और किसानों की संख्या हजारों के आंकडे को पार कर गई है। मंहगाई और मंदी का यह दौर विश्वव्यापी है ऐसे वौद्धिक भाषण देने वाले अनेक विद्वान यत्र तत्र मिल रहे है। अमेरीका के पूर्व राष्ट्रपति बूश ने तो विश्व भर की मंहगाई और मंदी की जिम्मेदारी भारतीयों पर ही डाल दी थी । उनका कहना था कि दूनिया भर में खानें पीनें की चीजों की जो कमी हो रही है और जिसके कारण इन चीजों के दाम आसमानो को छू रहे है उसका एक मुख्य कारण भारतीय लोग ही है। उनके अनुसार भारतीय बहुत ज्यादा खाते है या अप्रत्क्ष रूप से जरूरत से भी ज्यादा खाते है। जाहिर है जब एक देश के लोग, खासकर जिसकी आवादी सौ करोड़ को भी पार कर गई हो, ठुंस -ठुंस कर खाएगें तो दूसरे देशो में खाने पीने की चीजों की कमी आएगी और मंहगाई बढे़गी।
अमेरीका में राष्ट्रपति जो आम तौर पर जो वयांन देते हैं, वह उस क्षेत्र के विशेषयज्ञों की राय पर ही आधारित होता है । इसका अर्थ यह हुआ कि अमेरीका के अर्थ-शास्त्रीयों ने काफी खोजबीन करके और अपना मग्ज खपाकर विश्व भर की मंहगाई का जो कारण ढुढा वह भारतीयों के ठुंस-ठुंस कर खाने पीने के सभाव के कारण है। मनमोहन सिंह का भी चितंन के स्तर पर अमेंरीका के अर्थ-शास्त्रीयों की बीरादरी में ही शुमार होता है। अमेरीकी अर्थ-शास्त्र की जिस प्रकार अपनी एक आधार भूमि है उसी प्रकार साम्यवादी अर्थ-शास्त्र की एक विशिष्ट आधार भूमि है। इसी प्रकार भारतीय अर्थ-शास्त्र की एक अपनी परम्परा है। साम्यवादी अर्थ-शास्त्र तो अपने प्रयोग काल में ही पीटता चला आ रहा है और लगभग पीट ही गया है। अमेरीकी अथवा पूंजीवादी अर्थ-शास्त्र एक ओर शोषण पर आधारित हैं और दूसरी और मानव मन के भीतर सूप्त अवस्था मे पडी पशु वृतियों को जागृत करने के सिद्धात पर आधारित है। भारतीय अर्थ-शास्त्र परम्परा मानव के समर्ग विकास पर केन्द्रित है जिसे कभी दीन दयाल उपाध्याय ने एकात्म मानवदर्शन का नाम दिया था। यह भारतीय अर्थ-
शास्त्र के कारण ही था। जब पूरा विश्व मंदी की लपेट में आकर लड़खड़ा रहा था तो भारत सफलता पूर्वक इस आंधी को झेल गया।
डॉ0 मनमोहन सिंह अर्थ-शास्त्र के क्षेत्र में भारतीय परम्परा के नही बल्कि अमेरीकी परम्परा के अनुगामी है। दरसल वह अमेरीकी आर्थिक नीतियों को भारत में स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं। अर्थ-शास्त्र के क्षेत्र में उनका प्रशिक्षण अमेरीकी अथवा पूंजीवादी अर्थतंत्र मंे ही हुआ है। वह विश्व बैंक के मुलाजिम रह चुके हैं। विश्व बैंक अमेरीकी अर्थिक हितो और आर्थिक नीतियों का दूनिया भर में विस्तार करने के लिए वहुत बढा अडडा है। स्वभाविक है मनमोहन सिंह जब पूरी ईमानदारी से भी भारत मे बढ़ रही महगाई के कारणो की जांच पडताल करने के लिए निकलेगें तो वह उन्ही निष्कर्षो पर पहुचेगें जिन निष्कर्षो पर अमेरीका के राष्ट्रपति पहले ही पहुच चुके है। इसका मुख्य कारण यह है कि कारण निमानसा के लिए जिन सूत्रों और फारमूलांे का प्रयोग अमेरीका के अर्थ-शास्त्री कर रहे हैं उन्ही का प्रयोग डॉ0 मनमोहन सिंह कर रहे हैं।
कुछ अरसा पहले प्रधानमंत्री ने कहा था कि देश में महगाई वढने का मुख्य कारण यह है कि अब लोग ज्यादा चीजे और ज्यादा उत्पादन खरीद रहे है। सुवाभिक है जब वाजार में खरीददारों की संख्या एक दम बढ जाएगी तो वस्तुओं के दाम भी वढ़ जाएगें। तो महगाई का मुल कारण लोगों की खरीदने की क्षमता वढना है। लेकिन प्रशन है कि आचानक बाजार में इतने खरीददार कैसे आने लगे है। मनमोहन सिंह के पास इसका भी
उत्तर है। उनके अनुसार सरकार ने पिछले कुछ सालो से देश में जो आर्थिक नीतियां जो लागू की है उसके कारण लोगो के पास पैसा बहुत आ गया है। लोग खुशहाल होने लगे हैं। अब उनकी इच्छा अपने जीवन स्तर को उपर उठाने की है। इस लिए वह जेब में पैसा डाल कर बाजार में जाते है और उसके कारण मंहगाई बढ रही है। अर्थ-शास्त्री प्रधानमंत्री के इस पूरे विश्लेषण और स्पष्टीकरण का कुल मिलाकर सार यह है कि देश मंे बढ़ रही मंहगाई वास्तव में उनकी अर्थ नीतियों की सफलता और देश के विकास का संकेत है। यानि जितनी जितनी मंहगाई बढती जाएगी उतना-उतना ही देश विकास करता जाएगा।
अब मनमोहन सिंह अपने इस तर्क और विश्लेषण को खींच कर और आगे ले गए है। उनके अनुसार आर्थिक नीतियों की सफलता के कारण गरीबों के पास भी इतना पैसा आ गया है कि उन्होनें धडले से मांस, मूर्गी, मछली और अडे़ उडाने शुरू कर दिये है। जब गारीब भी खुशहाल हो रहा है और वह दिन रात मछली मूर्गी पर हाथ साफ कर रहा है तो मंहगाई तो बढे़गी ही। इस लिए मंहगाई पर रोने की जरूरत नही है बल्कि ढोल बजाने की जरूरत है क्योकि यह देश में खुशहाली का प्रतिक है। यह अलग बात है कि इस देश के लोग प्याज, आलू, टमाटर, हरी सब्जीयां, दालों इत्यादि की आसमान छुती मंहगाई का रोना रो रहे हैं । मछली, मंास और मूर्गी की मंहगाई की तो किसी ने बात ही नही की । इसमें मनमोहन सिंह का दोष नही है, क्योंकि जब वह भारत की मंहगाई पर अपना यह शोधपत्र अमेरीका में अंग्रेजी भाषा में छपी अर्थ-शास्त्र की किसी किताब के आधार पर लिख रहे होगें तो उसमें दाल और प्याज का उदाहरण तो नही ही होगा। वहां उदाहरण के लिए मांस और मंछली को ही लिया गया होगा।
मनमोहन सिंह के भारत में बढ़ रही मंहगाई पर किए गए इस शोध से अमेरीका के अर्थ-शास्त्री तो प्रसन्न हो सकते है परन्तु भारतीयों को निराशा ही हाथ लगेगी। मनमोहन सिंह की अपनी ही सरकार मनरेगा में करोडों लोगों को एक दिन के लिए 100 रूपये की मजदूरी देती है और वह भी साल में केवल सौ दिन के लिए । यानि एक साल के लिए मजदूर की तनख्वाह केवल दस हजार रूपये । साल भर में दस हजार की कमाई से कोई गरीब आदमी परीवार कैसे पाल सकता है और साथ ही मूर्गा मछली का भोज कैसे उडा सकता है, यह मनमोहन सिंह जैसे अर्थ-शास्त्री ही बेहतर बता सकते है। जिस स्पैकुलेटिव टेªडिंग की शुरूआत मनमोहन सिंह ने खाद्यान के क्षेत्र में भी की है वह किसान और मजदूर को आत्महत्या की और तो ले जा सकता है । मांस, मछली के भोज की और नही । वैसे भी देश के गरीब को भारत सरकार से केवल दाल रोटी की दरकार है, मांस मछली का भोज उन्ही को मुबारक जो दिल्ली में वैठ के गरीब के जख्मों पर नमक मिर्च छिडकते है।